
Viṣṇu-sahasranāma—Yudhiṣṭhira’s Inquiry and Bhīṣma’s Recitation (विष्णोर्नामसहस्रम्)
Upa-parva: Viṣṇu-sahasranāma Upākhyāna (Stotra-Prakaraṇa) within Anuśāsana-parva
Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing extensive dharma-instructions, Yudhiṣṭhira again questions Bhīṣma for a singular theological and practical solution: (i) the one deity in the world, (ii) the one supreme refuge, (iii) the object of praise and worship by which humans attain auspiciousness, (iv) the highest dharma among all dharmas, and (v) the recitative practice by which beings are released from the bondage of birth and worldly continuity. Bhīṣma answers by elevating Viṣṇu/Nārāyaṇa—described as anādi-nidhana (without beginning or end), jagat-prabhu (lord of the world), and sarva-loka-maheśvara (sovereign over all realms)—and introduces the Viṣṇu-sahasranāma as a continuous discipline of praise, worship, meditation, and salutation. The chapter then presents the sahasranāma catalogue of epithets, followed by explicit phalaśruti: claims of protection from inauspiciousness, social and personal flourishing, relief from fear and affliction, and orientation toward brahman/sanātana. The close reiterates cosmological dependence on Vāsudeva and frames the stotra as Vyāsa’s composition for śreyas and sukha.
Chapter Arc: भीष्म धर्मराज से कहते हैं कि ऋषिगण, पितर और देवता एकत्र होकर अरुन्धती से ‘धर्म-रहस्य’ सुनना चाहते हैं—गुह्यतम सत्य को प्रकट करने का आग्रह उठता है। → वसिष्ठ-पत्नी अरुन्धती तपोवृद्धि और देव-आह्वान का स्मरण कर शाश्वत धर्मों का वचन देती हैं; फिर चित्रगुप्त द्वारा कर्म-लेखा और दानधर्म के ‘पृथक्-पृथक् फल’ का विधान सामने आता है—कौन-सा दान किस पाप/दुःख को काटता है, यह सूक्ष्म प्रश्न तीखा होता जाता है। → चित्रगुप्त का निर्णायक मत: इस लोक में दिया हुआ दान नष्ट नहीं होता; और विशेषतः ‘कपिला गौ’ का दान ब्रह्महत्या-सदृश पापों तक को शुद्ध करने में समर्थ बताया जाता है—यह सुनकर सूर्यदेव तक रोमांचित हो उठते हैं, मानो दान की महिमा पर देव-समाज की मुहर लग जाती है। → अग्निहोत्र के पालन और उपानह (जूता), छत्र, कपिला गौ आदि के यथोचित दान का विधान, तथा पुष्कर-तीर्थ/ज्येष्ठ-पुष्कर जैसे पुण्य-क्षेत्रों का संकेत देकर अध्याय दानधर्म के व्यावहारिक मार्गदर्शन पर टिकता है।
Verse 1
2 अं ड-ऑ का त्रिशर्दाधिकशततमो<्ध्याय: अरुन्धती
ভীষ্ম বললেন—তারপর সকল ঋষিগণ, পিতৃগণ এবং দেবতাসহ, তপস্যায় মহীয়সী অরুন্ধতীর নিকট গিয়ে একাগ্রচিত্তে তাঁকে প্রশ্ন করলেন; তাঁরা তাঁর মুখ থেকে ধর্মের পরম রহস্য শুনতে চাইলেন।
Verse 2
समानशीलां वीर्येण वसिष्ठस्थ महात्मन: । त्वत्तों धर्मरहस्यानि श्रोतुमिच्छामहे वयम् । यत्ते गुहमतमं भद्ठे तत् प्रभाषितुमरहसि
ভীষ্ম বললেন—“ভদ্রে! আচরণে ও তেজে তুমি মহাত্মা বশিষ্ঠের সমান। তোমার কাছ থেকে আমরা ধর্মের গূঢ় রহস্য শুনতে চাই। তোমার দৃষ্টিতে যা সর্বাধিক গোপন ও গভীর ধর্ম, অনুগ্রহ করে তা-ই বলো।”
Verse 3
अरुन्धत्युवाच तपोवृद्धिर्मया प्राप्ता भवतां स्मरणेन वै । भवतां च प्रसादेन धर्मान् वक्ष्यामि शाश्वतान्
অরুন্ধতী বললেন—“তোমাদের স্মরণে আমার তপস্যাশক্তি বৃদ্ধি পেয়েছে। আর তোমাদের অনুগ্রহে আমি এখন সনাতন ধর্মসমূহ তাদের গূঢ় অর্থসহ ব্যাখ্যা করব। তোমরা শোনো। এই উপদেশ কেবল সেই শ্রদ্ধাবানকে দেওয়া উচিত, যার মন শুদ্ধ।”
Verse 4
सगुह्यान् सरहस्यांश्न॒ तान् शृणुध्वमशेषत: । श्रद्दधाने प्रयोक्तव्या यस्य शुद्धं तथा मन:
ভীষ্ম বললেন—গোপন ও গভীর রহস্যসমেত এই উপদেশসমূহ সম্পূর্ণরূপে শোনো। যার মন শুদ্ধ এবং যে শ্রদ্ধাবান, কেবল তাকেই এই ধর্মোপদেশ প্রদান করা উচিত।
Verse 5
अश्रद्दधानो मानी च ब्रह्महा गुरुतल्पग: । असम्भाष्या हि चत्वारो नैषां धर्म: प्रकाशयेत्
ভীষ্ম বললেন—যে শ্রদ্ধাহীন, যে অহংকারী, যে ব্রাহ্মণহন্তা, এবং যে গুরুর শয্যা লঙ্ঘনকারী (গুরুপত্নীগামী)—এই চারজনের সঙ্গে কথাও বলা উচিত নয়; তাদের সামনে ধর্মের গূঢ়ার্থ প্রকাশ করা উচিত নয়।
Verse 6
अहन्यहनि यो दद्यात् कपिलां द्वादशी: समा: । मासि मासि च सत्रेण यो यजेत सदा नर:
ভীষ্ম বললেন—যদি কোনো ব্যক্তি বারো বছর ধরে প্রতিদিন একটি করে কপিলা গাভী দান করে, আর মাসে মাসে অবিচ্ছিন্ন সত্রযজ্ঞ পালন করে—তবু সেই ধর্মকর্মের ফল তার সমান নয়, যার সেবায় অতিথি সত্যিই তৃপ্ত হয়।
Verse 7
गवां शतसहसंत्रं च यो दद्याज्ज्येष्ठपुष्करे । न तद्धर्मफलं तुल्यमतिथिर्यस्य तुष्यति
ভীষ্ম বললেন—যদি কেউ জ্যেষ্ঠ-পুষ্করে এক লক্ষ গাভী দানও করে, তবু সেই ধর্মকর্মের ফল তার সমান নয়, যার সেবায় অতিথি তৃপ্ত হয়।
Verse 8
श्रूयतां चापरो धर्मो मनुष्याणां सुखावह: । श्रद्दधानेन कर्तव्य: सरहस्यो महाफल:,अब मनुष्योंके लिये सुखदायक तथा महान् फल देनेवाले दूसरे धर्मका रहस्यसहित वर्णन सुनो। श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिये
ভীষ্ম বললেন—এখন মানুষের জন্য সুখদায়ক আরেক ধর্ম শোনো। শ্রদ্ধাসহকারে তা পালন করা উচিত; এটি রহস্যসমেত উপদিষ্ট এবং মহাফলদায়ক।
Verse 9
कल्यमुत्थाय गोमध्ये गृह दर्भान् सहोदकान् । निषिज्चेत गवां शुद्ध मस्तकेन च तज्जलम्
ভোরে উঠে গোরুর মধ্যে গিয়ে কুশ-দর্ভা জলসহ নিয়ে আসবে এবং গাভীদের উপর জল ছিটাবে। শুচি হয়ে সেই জল নিজের মস্তকেও ছিটাবে।
Verse 10
श्रूयन्ते यानि तीर्थानि त्रिषु लोकेषु कानिचित्
তিন লোকের মধ্যে যে যে তীর্থ প্রসিদ্ধ—সিদ্ধ, চারণ ও মহর্ষিদের দ্বারা সেবিত—সকল তীর্থে স্নান করলে যে ফল লাভ হয়, গোরুর শিং স্পর্শিত জল দিয়ে মস্তক সিঞ্চন করলেও সেই একই ফল লাভ হয়।
Verse 11
सिद्धचारणजुष्टानि सेवितानि महर्षिभि: । अभिषेक: समस्तेषां गवां शूड्रोदकस्य च
সিদ্ধ-চারণে পরিপূর্ণ ও মহর্ষিদের দ্বারা সেবিত যে তীর্থসমূহ তিন লোকেতে প্রসিদ্ধ, সেসবের সকল স্নান-অভিষেকের ফল গোরুর শিং ধোয়া জল মস্তকে ছিটালেই লাভ হয়।
Verse 12
साधु साध्विति चोद्दिष्टं देवतै: पितृभिस्तथा । भूतैश्नेव सुसंहृष्टे: पूजिता साप्यरुन्धती
এ কথা শুনে দেবগণ, পিতৃগণ এবং সকল প্রাণী পরম আনন্দে উদ্বেলিত হলেন। তাঁরা ‘সাধু! সাধু!’ বলে প্রশংসা করলেন এবং অরুন্ধতীকেও বহু সম্মানে পূজিত করলেন।
Verse 13
पितामह उवाच अहो धर्मों महाभागे सरहस्य उदाहृत: । वरं ददामि ते धन्ये तपस्ते वर्धतां सदा
পিতামহ বললেন—“আহা, মহাভাগে! তুমি রহস্যসহ ধর্মকে অপূর্বভাবে প্রকাশ করেছ। ধন্যে! আমি তোমাকে বর দিচ্ছি—তোমার তপস্যা সদা বৃদ্ধি পাক।”
Verse 14
यम उवाच रमणीया कथा दिव्या युष्मत्तो या मया श्रुता । श्रूयतां चित्रगुप्तस्य भाषितं मम च प्रियम्
যম বললেন—হে দেবগণ ও মহর্ষিগণ! তোমাদের মুখে আমি যে মনোরম, দিব্য কাহিনি শুনেছি, তা সত্যই প্রশংসনীয়। এখন চিত্রগুপ্তের বাণী শোনো—যা আমারও প্রিয়।
Verse 15
यमराजने कहा--देवताओ और महर्षियो! मैंने आपलोगोंके मुखसे दिव्य एवं मनोरम कथा सुनी है, अब आपलोग चित्रगुप्तका तथा मेरा भी प्रिय भाषण सुनिये ।।
যম বললেন—হে দেবগণ ও মহর্ষিগণ! তোমাদের মুখে আমি দিব্য ও মনোরম কাহিনি শুনেছি। এখন চিত্রগুপ্তের এবং আমারও প্রিয় বাণী শোনো। এটি ধর্ম-সংযুক্ত এক গূঢ় উপদেশ—মহর্ষিরাও যা শুনতে পারেন; আর যে শ্রদ্ধাবান মর্ত্য নিজের কল্যাণ চায়, তারও এটি শোনা উচিত।
Verse 16
न हि पुण्यं तथा पापं कृतं किंचिद् विनश्यति । पर्वकाले च यत् किंचिदादित्यं चाधितिष्ठति
যম বললেন—কৃত কোনো পুণ্য বা পাপ কখনও নষ্ট হয় না। আর পবিত্র পার্বণকালে, আদিত্যের অধিষ্ঠানে যা কিছু করা হয়, তাও ধর্ম-ব্যবস্থায় স্থিত হয়ে যথোচিত ফল দেয়।
Verse 17
मनुष्यका किया हुआ कोई भी पुण्य तथा पाप भोगके बिना नष्ट नहीं होता। पर्वकालमें जो कुछ भी दान किया जाता है, वह सब सूर्यदेवके पास पहुँचता है ।।
যম বললেন—মানুষের করা কোনো পুণ্য বা পাপ ভোগ না করে নষ্ট হয় না। পার্বণকালে যা কিছু দান করা হয়, তা সবই সূর্যদেবের নিকট পৌঁছে। মর্ত্য যখন প্রেতলোকে গমন করে, তখন বিভাবসু সূর্যদেব সেখানে সেই সব দান স্বীকার করে প্রদান করেন; আর পুণ্যাত্মা পুরুষ পরলোকে তা ভোগ করে।
Verse 18
जब मनुष्य प्रेतलोकको जाता है, उस समय सूर्यदेव वे सारी वस्तुएँ उसे अर्पित कर देते हैं और पुण्यात्मा पुरुष परलोकमें उन वस्तुओंका उपभोग करता है ।।
যম বললেন—মানুষ যখন প্রেতলোকে গমন করে, তখন সূর্যদেব সেই সব অর্ঘ্য তাকে প্রদান করেন, এবং পুণ্যাত্মা পুরুষ পরলোকে বিধিমতো তা ভোগ করে। এখন চিত্রগুপ্তের মতানুসারে আমি কিছু কল্যাণকর ধর্ম বলছি—মানুষের উচিত সর্বদা জলদান এবং দীপদান করা।
Verse 19
उपानहौ च छत्रं च कपिला च यथातथम् । पुष्करे कपिला देया ब्राह्मणे वेदपारगे
যম বললেন—যথাবিধি পাদুকা ও ছাতা, এবং তদ্রূপ কপিলা (তাম্রবর্ণা) গাভী দান করা উচিত। পুষ্করে বেদপারগ ব্রাহ্মণকে কপিলা গাভী দান করতে হবে।
Verse 20
अयं चैवापरो धर्मश्नित्रगुप्तेन भाषित:
যম বললেন—এটিও ধর্মের আর-এক বিধান, যা শ্নিত্রগুপ্ত ঘোষণা করেছেন।
Verse 21
फलमस्य पृथक््त्वेन श्रोतुमर्हन्ति सत्तमा: । प्रलयं सर्वभूतैस्तु गन्तव्यं कालपर्ययात्
হে সৎজনশ্রেষ্ঠগণ, তোমরা এর পৃথক ফল শুনবার যোগ্য। কিন্তু কালের পরিবর্তনে সকল প্রাণীকেই প্রলয়ের দিকে যেতে হয়।
Verse 22
इसके सिवा यह एक दूसरा धर्म भी चित्रगुप्तने बताया है। उसके पृथक्ू-पृथक् फलका वर्णन सभी साधु पुरुष सुनें। समस्त प्राणी कालक्रमसे प्रलयको प्राप्त होते हैं ।।
সেখানে দুর্গম স্থানে পৌঁছে প্রাণীরা ক্ষুধা-তৃষ্ণা নামক শত্রুদের দ্বারা পীড়িত হয়। দগ্ধ হতে হতে তারা যেন সিদ্ধ হয়; সেখান থেকে পালাবার উপায় নেই।
Verse 23
पापोंके कारण दुर्गम नरकमें पड़े हुए प्राणी भूख-प्याससे पीड़ित हो अतामें जलते हुए पकाये जाते हैं। वहाँ उस यातनासे निकल भागनेका कोई उपाय नहीं है ।।
অল্পবুদ্ধিরা ভয়ংকর অন্ধকার—ঘোর তমসে প্রবেশ করে। সেইজন্য আমি ধর্মের কথা বলছি, যার দ্বারা দুর্গম অবস্থা অতিক্রম করা যায়।
Verse 24
अल्पव्ययं महार्थ च प्रेत्य चैव सुखोदयम् । पानीयस्य गुणा दिव्या: प्रेतलोके विशेषत:
যম বললেন—এই ধর্মে ব্যয় অল্প, কিন্তু ফল মহৎ; আর মৃত্যুর পরেও এতে সত্য সুখের উদয় হয়। জলের গুণ দিব্য, এবং প্রেতলোকে সেই গুণ বিশেষভাবে প্রকাশ পায়।
Verse 25
तत्र पुण्योदका नाम नदी तेषां विधीयते । अक्षयं सलिलं तत्र शीतलं हामृतोपमम्
সেখানে তাদের জন্য ‘পুণ্যোদকা’ নামে এক নদী নির্ধারিত আছে। তার জল অক্ষয়—শীতল, নির্মল এবং অমৃতসম।
Verse 26
वहाँ पुण्योदका नामसे प्रसिद्ध नदी है, जो यमलोकनिवासियोंके लिये विहित है। उसमें अमृतके समान मधुर, शीतल एवं अक्षय जल भरा रहता है ।।
যম বললেন—সেখানে ‘পুণ্যোদকা’ নামে প্রসিদ্ধ এক নদী আছে, যা যমলোকবাসীদের জন্য নির্ধারিত। তাতে অমৃতসম মধুর, শীতল ও অক্ষয় জল ভরা থাকে। যে এ জগতে পানীয় জল দান করে, সে পরলোকে গিয়ে সেই নদীর জল পান করে। এখন দীপদান থেকে যে বিস্তৃত পুণ্য লাভ হয়, তা শোনো।
Verse 27
तमो<न्धकारं नियतं दीपदो न प्रपश्यति । प्रभां चास्य प्रयच्छन्ति सोमभास्करपावका:,दीपदान करनेवाला मनुष्य नरकके नियत अन्धकारका दर्शन नहीं करता। उसे चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि प्रकाश देते रहते हैं
যম বললেন—যে দীপদান করে, সে নরকের নির্ধারিত অন্ধকার দেখে না। চন্দ্র, সূর্য ও অগ্নি তাকে নিরন্তর আলো দান করে।
Verse 28
देवताश्चानुमन्यन्ते विमला: सर्वतो दिशः । द्योतते च यथा55दित्य: प्रेतलोकगतो नर:
যম বললেন—দেবতারাও সম্মতি দেন, আর চারদিকের দিকসমূহ নির্মল ও মঙ্গলময় হয়ে ওঠে। প্রেতলোকে গমনকারী মানুষ সেখানে সূর্যের মতো দীপ্তিমান হয়।
Verse 29
देवता भी दीपदान करनेवालेका आदर करते हैं। उसके लिये सम्पूर्ण दिशाएँ निर्मल होती हैं तथा प्रेतलोकमें जानेपर वह मनुष्य सूर्यके समान प्रकाशित होता है ।।
দেবতারাও দীপদানকারীদের সম্মান করেন। তার ফলে সর্বদিক নির্মল হয় এবং প্রেতলোকে গিয়ে সেই মানুষ সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান হয়। অতএব অবশ্যই দীপ দান করা উচিত, এবং বিশেষত পানীয় জল দান করা উচিত। যারা বেদপারগ ব্রাহ্মণকে কপিলা গাভী দান করে, তারা মহাপুণ্য লাভ করে।
Verse 30
पुष्करे च विशेषेण श्रूयतां तस्य यत् फलम् | गोशतं सवृषं तेन दत्तं भवति शाश्वतम्
আর বিশেষ করে পুষ্করে—তার ফল শোনো। সেখানে এ কর্ম করলে ষাঁড়সহ একশো গাভী দান করার ন্যায় চিরস্থায়ী পুণ্য লাভ হয়।
Verse 31
इसलिये विशेष यत्न करके दीप और जलका दान करना चाहिये। विशेषतः पुष्कर तीर्थमें जो वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणको कपिला दान करते हैं, उन्हें उस दानका जो फल मिलता है, उसे सुनो। उसे साँड़ों-लहित सौ गौओंके दानका शाश्वत फल प्राप्त होता है ।।
অতএব বিশেষ যত্ন করে দীপ ও জল দান করা উচিত। বিশেষত পুষ্কর তীর্থে যারা বেদপারগ ব্রাহ্মণকে কপিলা গাভী দান করে, তাদের সেই দানের ফল শোনো—তারা ষাঁড়সহ একশো গাভী দানের চিরস্থায়ী ফল লাভ করে। আর যে কোনো পাপকর্ম—এমনকি ব্রাহ্মণহত্যার সমান হলেও—কপিলা গাভী দান করলে তা শুদ্ধ হয়, যেমন একশো গাভী দানের ফল প্রাপ্ত হয়।
Verse 32
न तेषां विषम किंचिन्न दु:खं न च कण्टका:
তাদের জন্য কিছুই বিষম নয়; না দুঃখ, না কণ্টক—না কোনো বেদনাদায়ক বাধা।
Verse 33
उपानहौ च यो दद्यात् पात्रभूते द्विजोत्तमे । छत्रदाने सुखां छायां लभते परलोकग:
যে কেউ যোগ্য পাত্রকে—বিশেষত শ্রেষ্ঠ দ্বিজকে—পাদুকা (জুতোর জোড়া) দান করে, সে পরলোকে সুখ লাভ করে; আর ছত্রদান করলে পরলোকে মনোরম শীতল ছায়া লাভ হয়।
Verse 34
जो श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मणको उपानह (जूता) दान करता है, उसके लिये कहीं कोई विषम स्थान नहीं है। न उसे दुःख उठाना पड़ता है और न काँटोंका ही सामना करना पड़ता है। छत्र-दान करनेसे परलोकमें जानेपर दाताको सुखदायिनी छाया सुलभ होती है ।।
যমরাজ বললেন—যে ব্যক্তি শ্রেষ্ঠ ও সুপাত্র ব্রাহ্মণকে উপানহ (জুতো/চটি) দান করে, সে কখনও অসমতল বা দুর্গম ভূমিতে পড়ে না; তার দুঃখ হয় না, কাঁটার যন্ত্রণাও ভোগ করতে হয় না। ছত্রদান করলে পরলোকে গমনকালে দাতার জন্য সুখদায়িনী শীতল ছায়া সহজেই মেলে। সত্যই—একবার দান করলে সেই দান কখনও নষ্ট হয় না। চিত্রগুপ্তের সিদ্ধান্ত শুনে বিভাবসু (সূর্য) আনন্দে রোমাঞ্চিত হলেন।
Verse 35
उवाच देवता: सर्वा: पितंश्चैव महाद्युति: । श्रुतं हि चित्रगुप्तस्य धर्मगुहूं महात्मन:
মহাতেজস্বী যম সকল দেবতা ও পিতৃগণকে বললেন—“মহাত্মা চিত্রগুপ্তের ধর্মসম্বন্ধীয় গভীর ও গোপন উপদেশ আমি শুনেছি।”
Verse 36
इस लोकमें दिये हुए दानका कभी नाश नहीं होता। चित्रगुप्तका यह मत सुनकर भगवान् सूर्यके शरीरमें रोमांच हो आया। उन महातेजस्वी सूर्यने सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंसे कहा--“आपलोगोंने महामना चित्रगुप्तके धर्मविषयक गुप्त रहस्यको सुन लिया ।।
এই জগতে একবার দেওয়া দান কখনও নষ্ট হয় না। চিত্রগুপ্তের এই মত শুনে ভগবান সূর্য রোমাঞ্চিত হলেন। তখন সেই মহাতেজস্বী সূর্য সকল দেবতা ও পিতৃগণকে বললেন—“আপনারা মহামনা চিত্রগুপ্তের ধর্মসম্বন্ধীয় গোপন রহস্য শুনেছেন। যে মর্ত্যগণ মহাত্মা ব্রাহ্মণদের প্রতি শ্রদ্ধা রেখে এই দান প্রদান করে, তাদের কোনো ভয় থাকে না।”
Verse 37
धर्मदोषास्त्विमे पञज्च येषां नास्तीह निष्कृति: । असम्भाष्या अनाचारा वर्जनीया नराधमा:
যমরাজ বললেন—“ধর্মের এই পাঁচটি দোষের জন্য এখানে কোনো প্রায়শ্চিত্ত নেই। যারা আচরণহীন, তাদের সঙ্গে কথা বলা উচিত নয়; এমন নরাধমদের দূর থেকেই বর্জন করতে হবে।”
Verse 38
ब्रह्महा चैव गोघ्नक्ष परदाररतश्न यः । अश्रद्दधानश्न नर: स्त्रियं यश्चोपजीवति
যমরাজ বললেন—“ব্রাহ্মণহন্তা, গোহন্তা, পরস্ত্রী-আসক্ত, শ্রদ্ধাহীন ব্যক্তি, এবং যে নারীকে অবলম্বন করে জীবিকা নির্বাহ করে—এই পাঁচজনই পূর্বোক্ত দুষ্কর্মী।”
Verse 39
प्रेतलोकगता होते नरके पापकर्मिण: । पच्यन्ते वै यथा मीना: पूयशोणितभोजना:,ये पापकर्मी मनुष्य प्रेतलोकमें जाकर नरककी आगमें मछलियोंकी तरह पकाये जाते हैं और पीब तथा रक्त भोजन करते हैं
যম বললেন—যারা পাপকর্ম করে, তারা প্রেতলোকে গিয়ে নরকে পতিত হয়। সেখানে তারা অগ্নিতে মাছের মতো সিদ্ধ হয় এবং পুঁজ ও রক্তই তাদের আহার হয়।
Verse 40
असम्भाष्या: पितृणां च देवानां चैव पञज्च ते । स्नातकानां च विप्राणां ये चानये च तपोधना:,इन पाँचों पापाचारियोंसे देवताओं, पितरों, स्नातक ब्राह्मणों तथा अन्यान्य तपोधनोंको बातचीत भी नहीं करनी चाहिये
যম বললেন—এই পাঁচজনের সঙ্গে কথা বলা উচিত নয়। দেবগণ ও পিতৃগণ, তদ্রূপ স্নাতক ব্রাহ্মণগণ এবং অন্যান্য তপোধন সন্ন্যাসীও এমন পাপাচারীদের সঙ্গে বাক্যালাপ পর্যন্ত করবেন না।
Verse 96
प्रतीच्छेत निराहारस्तस्य धर्मफलं शृणु । सबेरे उठकर कुश और जल हाथमें ले गौओंके बीचमें जाय। वहाँ गौओंके सींगपर जल छिड़के और सींगसे गिरे हुए जलको अपने मस्तकपर धारण करे। साथ ही उस दिन निराहार रहे। ऐसे पुरुषको जो धर्मका फल मिलता है
নিরাহার থেকে এই বিধান পালন কর; এখন তার ধর্মফল শোনো। প্রাতে উঠে হাতে কুশ ও জল নিয়ে গাভীদের মধ্যে যাবে। সেখানে গাভীদের শিঙে জল ছিটাবে এবং শিঙ থেকে ঝরে-পড়া জল নিজের মস্তকে ধারণ করবে। সেই দিন উপবাস থাকবে। এভাবে যে পালন করে, তার যে ধর্মফল হয়, তা শোনো।
Verse 130
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अरुन्धतीचित्रगुप्तरहस्ये त्रिंशयवधिकशततमो<ध्याय:
এইভাবে শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের দানধর্মপর্বে ‘অরুন্ধতী-চিত্রগুপ্ত-রহস্য’ নামক একশো ত্রিশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 196
अन्निहोत्रं च यत्नेन सर्वश: प्रतिपालयेत । उपानह (जूता)
যম উপদেশ দিলেন—অগ্নিহোত্রের বিধান সর্বতোভাবে যত্নসহকারে পালন করা উচিত। সঙ্গে যথাবিধি উপানহ (জুতো) ও ছত্র দান করতে হবে এবং বিশেষত কপিলা গাভী দান করতে হবে। পুষ্কর তীর্থে বেদে পারদর্শী বিদ্বান ব্রাহ্মণকে কপিলা গাভী দান করে সম্মানিত করবে এবং অগ্নিহোত্রের নিয়ম সর্বপ্রকারে যত্নসহকারে রক্ষা করবে।
Verse 313
तस्मात्तु कपिला देया कौमुद्रां ज्येष्ठपुष्करे । ब्रह्म हत्याके समान जो कोई पाप होता है
অতএব কার্ত্তিক পূর্ণিমায় জ্যেষ্ঠপুষ্করে কৌমুদ্রীবর্ণা কপিলা গাভী দান করা উচিত। শাস্ত্রে বলা হয়েছে—এই একটিমাত্র কপিলা-দান ব্রহ্মহত্যার সমান মহাপাপও শুদ্ধ করে, এবং এই এক গোদান শত গোদানের সমান পুণ্যফলদায়ক। সুতরাং জ্যেষ্ঠপুষ্কর তীর্থে কার্ত্তিক পূর্ণিমায় অবশ্যই কপিলা গাভী দান করা কর্তব্য।
He seeks a single, reliable criterion for auspiciousness and liberation—one deity, one refuge, one highest dharma, and one recitative practice capable of loosening saṃsāra-bondage amid plural duties and teachings.
That sustained praise and remembrance of Viṣṇu/Nārāyaṇa through the sahasranāma—joined with devotion, worship, and mental focus—constitutes a superior, integrative dharma that supports both well-being and release.
Yes. It presents outcomes attributed to hearing/reciting the names—avoidance of inauspiciousness, mitigation of fear and affliction, attainment of prosperity and stability, and a culminating orientation toward brahman/sanātana—functioning as meta-commentary on the practice’s perceived efficacy.