ययातेर्वानप्रस्थतपःस्वर्गारोहणम् | Yayāti’s Vānaprastha Austerities and Ascent to Heaven
(रहस्थेनां समाहूय न वर्दे्न च संस्पृशे: । वहस्व भार्या भद्रें ते यथाकाममवाप्स्यसि ।।) तुम्हारा कल्याण हो। इस शर्मिष्ठाको एकान्तमें बुलाकर न तो इससे बात करना और न इसके शरीरका स्पर्श ही करना। अब तुम विवाह करके इसे अपनी पत्नी बनाओ। इससे तुम्हें इच्छानुसार फलकी प्राप्ति होगी। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्र कृत्वा प्रदक्षिणम् । शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर राजा ययातिने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधिसे मंगलमय विवाह-कार्य सम्पन्न किया
rahasthenām samāhūya na vardēn ca samspṛśeḥ | vahasva bhāryām bhadre te yathākāmam avāpsyasi || evam ukto yayātis tu śukraṁ kṛtvā pradakṣiṇam | śāstroktavidhinā rājā vivāham akaroc chubham ||
শুক্র বললেন—গোপনে তাকে ডেকে তার সঙ্গে কথা বলবে না, তার দেহও স্পর্শ করবে না। তোমার মঙ্গল হোক; ধর্মমতে তাকে পত্নীরূপে গ্রহণ কর—তার দ্বারা তুমি ইচ্ছিত ফল লাভ করবে। বৈশম্পায়ন বললেন—এ কথা শুনে যযাতি শুক্রের প্রদক্ষিণ করলেন এবং শাস্ত্রবিধি অনুসারে মঙ্গলময় বিবাহ সম্পন্ন করলেন।
वैशम्पायन उवाच