Yayāti’s Abdication and Pūru’s Coronation (ययाति-पूोरु-राज्याभिषेकः)
देवयान्युवाच स्तुवतो दुहिताहं ते याचत: प्रतिगृह्नतः । स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि,देवयानीने कहा--अरी! मैं तो स्तुति करनेवाले और दान लेनेवाले भिक्षुककी पुत्री हूँ और तुम उस बड़े बापकी बेटी हो, जिसकी मेरे पिता स्तुति करते हैं; फिर मेरी दासी बनकर कैसे रहोगी
দেবযানী বলল—হে মূঢ়ে! আমি তো স্তবকারী ও দানগ্রাহী ভিক্ষুকের কন্যা; আর তুমি সেই মহাপিতার কন্যা, যাঁর স্তব আমার পিতা করেন। তবে তুমি কী করে আমার দাসী হয়ে থাকবে?
वैशम्पायन उवाच