ययाति–देवयानी संवादः
Yayāti–Devayānī Dialogue and Śukra’s Consent
रक्षते दानवांस्तत्र न स रक्षत्यदानवान् | तमाराधयितुं शक्तो भवान् पूर्ववया: कविम्,“वहाँ रहकर वे दानवोंकी रक्षा करते हैं। जो दानव नहीं हैं, उनकी रक्षा नहीं करते। आपकी अभी नयी अवस्था है, अतः आप शुक्राचार्युकी आराधना (करके उन्हें प्रसन्न) करनेमें समर्थ हैं"
“সেখানে তিনি দানবদের রক্ষা করেন; যারা দানব নয়, তাদের রক্ষা করেন না। আপনার বয়স এখনও নবীন; অতএব আপনি সেই কবি (শুক্রাচার্য)-এর আরাধনা করতে সক্ষম।”
वैशम्पायन उवाच