Śukra’s Ultimatum and Devayānī’s Demand (शुक्र-प्रतिज्ञा तथा देवयानी-वर-याचना)
पृथिवी रत्नसम्पूर्णा हिरण्यं पशव: स्त्रिय: । नालमेकस्य तत् सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्,'रत्नोंसे भरी हुई सारी पृथ्वी, संसारका सारा सुवर्ण, सारे पशु और सुन्दरी स्त्रियाँ किसी एक पुरुषको मिल जायँ, तो भी वे सब-के-सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे। वह और भी पाना चाहेगा। ऐसा समझकर शान्ति धारण करे--भोगेच्छाको दबा दे
pṛthivī ratnasampūrṇā hiraṇyaṃ paśavaḥ striyaḥ | nālam ekasya tat sarvam iti matvā śamaṃ vrajet ||
বৈশম্পায়ন বললেন—যদি রত্নে পরিপূর্ণ সমগ্র পৃথিবী, স্বর্ণ, গবাদি পশু ও সুন্দরী নারীরা এক জন মানুষেরই লাভ হয়, তবু তা তার জন্য যথেষ্ট হবে না—সে আরও চাইবে। এই সত্য জেনে শান্তি অবলম্বন কর; ভোগ ও সঞ্চয়ের আকাঙ্ক্ষা সংযত কর।
वैशम्पायन उवाच