जहार च स वित्राणां रत्नान्युत्क्रोशतामपि । महायशस्वी पुरूरवा मनुष्य होकर भी मानवेतर प्राणियोंसे घिरे रहते थे। वे अपने बल- पराक्रमसे उन्मत्त हो ब्राह्मणोंके साथ विवाद करने लगे। बेचारे ब्राह्मण चीखते-चिल्लाते रहते थे तो भी वे उनका सारा धन-रत्न छीन लेते थे
মহাযশস্বী পুরূরবা ব্রাহ্মণদের আর্তচিৎকার সত্ত্বেও তাদের রত্ন-ধন কেড়ে নিত।
वैशम्पायन उवाच