Janamejaya’s Request for Expansion; Vaiśampāyana’s Authorization and Phalāśruti of the Mahābhārata
Jaya
/ अपन प्रात बछ। अ-काज जा षट्पज्चाशत्तमो<5 ध्याय: राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना जनमेजय उवाच बालो>प्ययं स्थविर इवावभाषते नायं बाल: स्थविरो<यं मतो मे । इच्छाम्यहं वरमस्मै प्रदातुं तन्मे विप्रा: संविदध्वं यथावत्,जनमेजयने कहा--्राह्मणो! यह बालक है तो भी वृद्ध पुरुषोंके समान बात करता है, इसलिये मैं इसे बालक नहीं, वृद्ध मानता हूँ और इसको वर देना चाहता हूँ। इस विषयमें आपलोग अच्छी तरह विचार करके अपनी सम्मति दें
janamejaya uvāca | bālo 'py ayaṁ sthavira ivāvabhāṣate nāyaṁ bālaḥ sthaviro 'yaṁ mato me | icchāmy ahaṁ varam asmai pradātuṁ tan me viprāḥ saṁvidadhvaṁ yathāvat ||
জনমেজয় বললেন— এ বালক হয়েও বৃদ্ধের মতো কথা বলে; অতএব আমার মতে এ শিশু নয়, পরিণত বুদ্ধিসম্পন্ন। আমি একে বর দিতে ইচ্ছা করি। হে ব্রাহ্মণগণ, আপনারা যথাযথ বিচার করে আমাকে সঠিক পরামর্শ দিন।
जनमेजय उवाच