Vyāsa’s Arrival at Janamejaya’s Sarpasatra; Commissioning of Vaiśaṃpāyana’s Recital (व्यासागमनम्)
जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथि: । तत्र पञठ्चत्वमापन्ना: प्रेतलोक॑ गमिष्यथ,(अश्वोंका राजा जो उच्चै:श्रवा है, उसके रंगको लेकर विनताके साथ कढद्रूने बाजी लगायी थी। उसमें यह शर्त थी--“जो हारे वह जीतनेवालीकी दासी बने।” कद्रू उच्चै:श्रवाकी पूँछ काली बता चुकी थी। अतः उसने अपने पुत्रोंसे कहा--“तुमलोग छलपूर्वक उस घोड़ेकी पूँछ काले रंगकी कर दो।' सर्प इससे सहमत न हुए। तब उन्होंने सर्पोको शाप देते हुए कहा --) पुत्रों! तुमलोगोंने मेरे कहनेसे अश्वराज उच्चै:श्रवाकी पूँछका रंग न बदलकर विनताके साथ जो मेरी दासी होनेकी शर्त थी, उसमें--उस घोड़ेके सम्बन्धमें विनताके कथनको मिथ्या नहीं कर दिखाया, इसलिये जनमेजयके यज्ञमें तुमलोगोंको आग जलाकर भस्म कर देगी और तुम सभी मरकर प्रेतलोकको चले जाओगे”
janamejayasya vo yajñe dhakṣyaty anilasārathiḥ | tatra pañcatvam āpannāḥ pretalokaṁ gamiṣyatha ||
আস্তীক বললেন— “রাজা জনমেজয়ের যজ্ঞে বায়ুকে সারথি করে অগ্নি তোমাদের দগ্ধ করবে। সেখানেই তোমাদের বিনাশ হবে; আর মৃত্যুর পরে তোমরা প্রেতলোকে গমন করবে।”
आस्तीक उवाच