Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
महानतिक्रमो होष तक्षकस्य दुरात्मन: । द्विजस्य योडददद् द्रव्यं मा नृपं जीवयेदिति,दुरात्मा तक्षकका यह सबसे बड़ा अपराध है कि उसने ब्राह्मणदेवको इसलिये धन दिया कि वे महाराजको जिला न दें
mahān atikramaḥ eṣa takṣakasya durātmanaḥ | dvijasya yo dadad dravyaṃ mā nṛpaṃ jīvayed iti ||
জনমেজয় বললেন—দুরাত্মা তক্ষকের এ এক মহা অপরাধ: সে এক ব্রাহ্মণকে ধন দিল এই উদ্দেশ্যে—‘রাজাকে পুনর্জীবিত করো না’।
जनमेजय उवाच