Āstīka-stuti at Janamejaya’s Sacrifice (आस्तीकस्तुतिः / यज्ञप्रशंसा)
यथावृत्त॑ तु तत् सर्व तक्षकस्य द्विजस्थ च । एतत् ते कथितं राजन् यथा दृष्टं श्रुतं च यत् श्रुत्वा च नृपशार्दूल विधत्स्व यदनन्तरम्,राजन! इस प्रकार हमने जो कुछ सुना और देखा है, वह सब तुम्हें कह सुनाया। भूपालशिरोमणे! यह सुनकर अब तुम्हें जैसा उचित जान पड़े, वह करो
হে রাজন! তক্ষক ও ব্রাহ্মণের যা কিছু যেমন ঘটেছিল, আমরা তা যেমন দেখেছি ও শুনেছি তেমনই তোমাকে বললাম। হে নৃপশার্দূল! এটি শুনে এখন যা যথোচিত মনে কর, তাই করো।
जनमेजय उवाच