Ādi Parva, Adhyāya 47 — Janamejaya’s Sarpa-satra: Vow, Preparation, and the Onset of the Serpent Offering
इति निश्चित्य मनसा जरत्कारुर्भुजड़मा । तमृषिं दीप्ततपसं शयानमनलोपमम्,मन-ही-मन ऐसा निश्चय करके मीठे वचन बोलनेवाली नागकन्या जरत्कारुने वहाँ सोते हुए अग्निके समान तेजस्वी एवं तीव्र तपस्वी महर्षिसे मधुरवाणीमें यों कहा--“महाभाग! उठिये, सूर्यदेव अस्ताचलको जा रहे हैं
মনে মনে এমন স্থির করে মধুরভাষিণী নাগকন্যা জরৎকারু সেখানে শয়নরত, অগ্নিসদৃশ তেজস্বী ও তীব্র তপস্বী ঋষিকে কোমল কণ্ঠে বলল— “মহাভাগ! উঠুন, সূর্যদেব অস্তাচলের দিকে যাচ্ছেন।”
तक्षक उवाच