Jaratkāru’s Marital Compact and Departure (जरत्कारु–जरत्कारुणी संवादः)
द्विजेन्द्र यद् विषं हनया मम वा मद्विधस्य वा । कं त्वमर्थमभिप्रेप्सुर्यासि तत्र तपोधन,“तपस्याके धनी द्विजेन्द्र! जब तुम मेरे या मेरे-जैसे दूसरे सर्पके विषको अपनी विद्याके बलसे नष्ट कर सकते हो तो बताओ, तुम कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करनेकी इच्छासे वहाँ जा रहे हो
তপোধন দ্বিজেন্দ্র! তুমি যদি আমার বা আমার মতো অন্য সাপের বিষও তোমার বিদ্যার বলে নাশ করতে পারো, তবে বলো—কোন উদ্দেশ্য সিদ্ধ করতে তুমি সেখানে যাচ্ছ?
काश्यप उवाच