अध्याय ३४ — एलापत्रस्योपदेशः
Elāpatra’s Counsel on the Nāgas’ Deliverance
ऑपन--+ह< बक। है २ >> चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय: इन्द्र और गरुडकी मित्रता, कस पक लेकर नागोंके पास आना और विनताको दासी छुड़ाना तथा इन्द्रद्ारा अमृतका अपहरण गरुड उवाच सख्यं मे<स्तु त्वया देव यथेच्छसि पुरन्दर । बल॑ तु मम जानीहि महच्चासह[मेव च,गरुडने कहा--देव पुरन्दर! जैसी तुम्हारी इच्छा है, उसके अनुसार तुम्हारे साथ (मेरी) मित्रता स्थापित हो। मेरा बल भी जान लो, वह महान् और असहा है
garuḍa uvāca | sakhyaṃ me 'stu tvayā deva yathecchasi purandara | balaṃ tu mama jānīhi mahac cāsahyam eva ca ||
গরুড় বললেন—হে দেব পুরন্দর! তোমার ইচ্ছামতোই তোমার সঙ্গে আমার মৈত্রী স্থাপিত হোক। তবে আমার শক্তিও জেনে রাখো—তা মহৎ এবং অপ্রতিরোধ্য।
गरुड उवाच