Garuḍa’s Inquiry on Permissible Prey and Vinatā’s Counsel (ब्राह्मणावध्यता–उपदेशः)
सुरार्थाय समुत्पन्नो रोषो राहोस्तु मां प्रति बह्ननर्थकरं पापमेको5हं समवाप्लुयाम्,वे सोचने लगे, “देवताओंके हितके लिये ही मैंने राहुका भेद खोला था जिससे मेरे प्रति राहुका रोष बढ़ गया। अब उसका अत्यन्त अनर्थकारी परिणाम दुःखके रूपमें अकेले मुझे प्राप्त होता है
তিনি ভাবতে লাগলেন—“দেবতাদের কল্যাণের জন্যই আমি রাহুর ভেদ প্রকাশ করেছিলাম; তাতেই আমার প্রতি রাহুর ক্রোধ বেড়ে গেল। এখন তার অতি অনর্থকর ফল দুঃখরূপে একা আমাকেই ভোগ করতে হচ্ছে।”
युपर्ण उवाच