आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वश: । मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनंजय,“कुरुनन्दन! वह समय कब आनेवाला है, इसे भी मैं जानता हूँ। तुम्हारे महान् तपसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें सम्पूर्ण आग्नेय तथा सब प्रकारके वायव्य अस्त्र प्रदान करूँगा। धनंजय! उसी समय तुम मेरे सम्पूर्ण अस्त्रोंको ग्रहण करोगे”
āgneyāni ca sarvāṇi vāyavyāni ca sarvaśaḥ | madīyāni ca sarvāṇi grahīṣyasi dhanaṃjaya |
বৈশম্পায়ন বললেন—“ধনঞ্জয়! তুমি সমস্ত আগ্নেয়, সর্বপ্রকার বায়ব্য এবং আমারও সকল অস্ত্র গ্রহণ করবে।”
वैशम्पायन उवाच