अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् । मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये। मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला--'अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ” || ४१-४२ ह || तस्य भीतस्वन श्रुत्वा मा भैरिति धनंजय:,कृष्णमशभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् | उन्होंने उस जलते हुए वनको और मारनेके लिये अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको देखा। उत्पात और आर्तनादके शब्दसे उस वनमें खड़े हुए वे सभी प्राणी संत्रस्त- से हो उठे थे। उस वनको अनेक प्रकारसे दग्ध होते देख और अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्णपर दृष्टि डाल भयानक आर्तनाद करने लगे
vaiśampāyana uvāca | abhidhāvārjunety evaṁ mayas trāhīti cābravīt |
তখন ময় বলল—“অর্জুন, ছুটে এসো; আমাকে রক্ষা করো, আমাকে রক্ষা করো।” তার ভীত কণ্ঠস্বর শুনে ধনঞ্জয় বললেন—“ভয় কোরো না।”
वैशम्पायन उवाच