नाशवनुवंश्व भूतानि महान्त्यपि रणेडर्जुनम्,कृष्णमशभ्युद्यतास्त्रं च नादं मुमुचुरुल्बणम् | उन्होंने उस जलते हुए वनको और मारनेके लिये अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्ण तथा अर्जुनको देखा। उत्पात और आर्तनादके शब्दसे उस वनमें खड़े हुए वे सभी प्राणी संत्रस्त- से हो उठे थे। उस वनको अनेक प्रकारसे दग्ध होते देख और अस्त्र उठाये हुए श्रीकृष्णपर दृष्टि डाल भयानक आर्तनाद करने लगे अमोघ अस्त्रधारी अर्जुको उस समय बड़े-से-बड़े प्राणी देख भी न सके, फिर रणभूमिमें युद्ध तो कर ही कैसे सकते थे। वे कभी एक ही बाणसे सैकड़ोंको बींध डालते थे और कभी एकहीको सौ बाणोंसे घायल कर देते थे
nāśvānuvamśva bhūtāni mahānty api raṇe 'rjunam, kṛṣṇam abhyudyatāstraṃ ca nādaṃ mumucur ulbaṇam |
বৈশম্পায়ন বললেন— যুদ্ধে বৃহত্তম প্রাণীরাও অর্জুনকে সহ্য করতে পারল না। জ্বলন্ত অরণ্য এবং প্রহারের জন্য অস্ত্রোন্নত শ্রীকৃষ্ণ-অর্জুনকে দেখে সেখানে দাঁড়িয়ে থাকা প্রাণীরা আতঙ্কে ভেঙে পড়ে ভয়ংকর চিৎকার তুলল। অমঙ্গল-লক্ষণ ও আর্তনাদে আচ্ছন্ন হয়ে তারা উচ্চস্বরে বিলাপ করল; কারণ যে অমোঘাস্ত্রধারী অর্জুনকে দেখতেই পারে না, সে রণক্ষেত্রে যুদ্ধ করবে কীভাবে?
वैशम्पायन उवाच