तस्य पूर्व शिरो ग्रस्तं पुच्छमस्य निगीर्य च । निगीर्यमाणा साक्रामत् सुतं नागी मुमुक्षया,उसने पहले उसका मस्तक निगल लिया। फिर धीरे-धीरे पूँछतकका भाग निगल गयी। निगलते-निगलते ही उस नागिनने पुत्रको बचानेके लिये आकाशमें उड़कर निकल भागनेकी चेष्टा की
tasya pūrvaṃ śiro grastaṃ puccham asya nigīrya ca | nigīryamāṇā sākramat sutaṃ nāgī mumukṣayā ||
বৈশম্পায়ন বললেন— সে প্রথমে তার মস্তক গিলে নিল, তারপর তার লেজও গিলে ফেলল। গিলতে গিলতেই সেই নাগিনী পুত্রকে রক্ষা করতে চেয়ে সরে যেতে লাগল।
वैशम्पायन उवाच