कद्रू-इन्द्र-स्तुतिः तथा नागानां तापनिवृत्तिः
Kadrū’s Hymn to Indra and the Nāgas’ Distress
ददृशाते<थ ते तत्र समुद्र निधिमम्भसाम् । महान्तमुदकागाध॑ क्षो भ्यमाणं महास्वनम्,कुछ दूर जानेपर उन्होंने मार्गमें जलनिधि समुद्रको देखा, जो महान् होनेके साथ ही अगाध जलसे भरा था। मगर आदि जल-जन्तु उसे विक्षुब्ध कर रहे थे और उससे बड़े जोरकी गर्जना हो रही थी
তারপর তারা সেখানে জলরাশির ভাণ্ডার সমুদ্রকে দেখল—অতিবৃহৎ, অগাধ জলে পরিপূর্ণ, জলচরদের আন্দোলনে ক্ষুব্ধ, এবং প্রবল গর্জনে মুখর।
शौनक उवाच