खाण्डवप्रस्थप्रवेशः तथा इन्द्रप्रस्थनिर्माणवर्णनम् | Entry into Khāṇḍavaprastha and Description of Indraprastha’s Founding
सपत्नवृद्धिं यत् तात मन्यसे वृद्धिमात्मन: । अभिष्टौषि च यत् क्षत्तु: समीपे द्विषतां वर,“महाराज! विदुरके समीप हम आपसे आपका कोई दोष नहीं बता सकते। इस समय एकान्त है, इसलिये कहते हैं। आप यह क्या करना चाहते हैं? पूज्य पिताजी! आप तो शत्रुओंकी उन्नतिको ही अपनी उन्नति मानने लगे हैं और विदुरजीके निकट हमारे वैरियोंकी ही भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं
sapatnavṛddhiṁ yat tāta manyase vṛddhim ātmanaḥ | abhiṣṭauṣi ca yat kṣattuḥ samīpe dviṣatāṁ vara ||
বৈশম্পায়ন বললেন—পিতা, তুমি প্রতিদ্বন্দ্বীদের সমৃদ্ধিকেই নিজের সমৃদ্ধি বলে মনে করতে শুরু করেছ; আর বিদুরের সামনে আমাদের প্রতি বিদ্বেষীদের মধ্যে যে শ্রেষ্ঠ, তাকেও তুমি অতিশয় প্রশংসা কর। বিদুরের সান্নিধ্যে আমরা তোমার দোষ প্রকাশ্যে বলতে পারি না; কিন্তু এখন নির্জনে জিজ্ঞাসা করি—তুমি কী করতে চাও?
वैशम्पायन उवाच