Ādi Parva, Adhyāya 180 — Svayaṃvara-Virodha and Pāṇḍava Parākrama
Draupadī Episode
संहारो हि यदा लोके भृगूणां क्षत्रियाधमै: । आगर्भोच्छेदनात् क्रान्तस्तदा मां मन्युराविशत्,इन नीच क्षत्रियोंने जब गर्भके बच्चोंतकके सिर काट-काटकर संसारमें भृगुवंशी ब्राह्मणोंका संहार आरम्भ कर दिया, तब मुझमें क्रोधका आवेश हुआ तेन यज्ञेन शुभ्रेण हूयमानेन शक्तिज: । तद्विदीपितमाकाशं सूर्येणेव घनात्यये (पापी राक्षसोंका संहार करनेके कारण) वह यज्ञ अत्यन्त निर्मल एवं शुद्ध समझा जाता था। शक्तिनन्दन पराशरद्वारा उसमें यज्ञसामग्रीका हवन आरम्भ होते ही (वह इतना प्रज्वलित हो उठा कि) उसके तेजसे सम्पूर्ण आकाश ठीक उसी तरह उद्धासित होने लगा, जैसे वर्षा बीतनेपर सूर्यकी प्रभासे उद्दीप्त हो उठता है
saṃhāro hi yadā loke bhṛgūṇāṃ kṣatriyādhamaiḥ | āgarbhocchedanāt krāntas tadā māṃ manyur āviśat || tena yajñena śubhreṇa hūyamānena śaktijaḥ | tad vidīpitam ākāśaṃ sūryeṇeva ghanātyaye ||
ঔর্ব বললেন— “যখন এই জগতে অধম ক্ষত্রিয়রা ভৃগুবংশের সংহার শুরু করল—গর্ভস্থ শিশুকেও কেটে ফেলল—তখন আমার মধ্যে ক্রোধ প্রবেশ করল।” আর শক্তিপুত্র পরাশর যখন সেই পরম নির্মল যজ্ঞে আহুতি দিতে শুরু করলেন, তখন হোমাগ্নি এমনভাবে জ্বলে উঠল যে তার তেজে সমগ্র আকাশ আলোকিত হয়ে উঠল—যেমন বর্ষার মেঘ কেটে গেলে সূর্যের কিরণে।
ऑर्व उवाच