पाण्डवानां पाञ्चालगमनम्
The Pāṇḍavas’ Journey toward Pāñcāla and News of the Svayaṃvara
बलाबल विनिश्चित्य तप एव परं बलम् | स राज्यं स्फीतमुत्सज्य तां च दीप्तां नृपश्रियम्,इस प्रकार बलाबलका विचार करके उन्होंने तपस्याको ही सर्वोत्तम बल निश्चत किया और अपने समृद्धिशाली राज्य तथा देदीप्यमान राज्यलक्ष्मीको छोड़कर, भोगोंको पीछे करके तपस्यामें ही मन लगाया। इस तपस्यासे सिद्धिको प्राप्त हो उद्दीप्त तेजवाले विश्वामित्रजीने अपने प्रभावसे सम्पूर्ण लोकोंको स्तब्ध एवं संतप्त कर दिया और (अन्ततोगत्वा) ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया; फिर वे इन्द्रके साथ सोमपान करने लगे
balābala-viniścitya tapa eva paraṁ balam | sa rājyaṁ sphītam utsṛjya tāṁ ca dīptāṁ nṛpaśriyam |
বল-অবল বিচার করে তিনি স্থির করলেন—তপস্যাই পরম বল। অতঃপর তিনি সমৃদ্ধ রাজ্য ও দীপ্ত রাজশ্রী ত্যাগ করে, ভোগবিলাসকে পিছনে ফেলে তপস্যাতেই মন স্থাপন করলেন।
गन्धर्व उवाच