Amṛta-Pāna, Rāhu’s Detection, and the Sudarśana Intervention (अमृतपान-राहुप्रकाशन-सुदर्शनप्रयोगः)
कनकाभरणं चित्र देवगन्धर्वसेवितम् । अप्रमेयमनाधृष्यमधर्मबहुलैर्जनै:,उग्रश्रवाजीने कहा--शौनकजी! मेरु नामसे प्रसिद्ध एक पर्वत है, जो अपनी प्रभासे प्रजवलित होता रहता है। वह तेजका महान् पुंज और परम उत्तम है। अपने अत्यन्त प्रकाशमान सुवर्णमय शिखरोंसे वह सूर्यदेवकी प्रभाको भी तिरस्कृत किये देता है। उस स्वर्णभूषित विचित्र शैलपर देवता और गन्धर्व निवास करते हैं। उसका कोई माप नहीं है। जिनमें पापकी मात्रा अधिक है, ऐसे मनुष्य वहाँ पैर नहीं रख सकते
kanakābharaṇaṁ citraṁ devagandharvasevitam | aprameyam anādhṛṣyam adharmabahulair janaiḥ ||
“সে স্বর্ণালঙ্কারে ভূষিত, বিচিত্ররূপ, দেব ও গন্ধর্বদের দ্বারা সেবিত। সে অপরিমেয় ও অদম্য; যাদের মধ্যে অধর্মের প্রাবল্য, তারা সেখানে পদার্পণ করতে পারে না।”
शौनक उवाच