तच्च तत्र कृतं कर्म तवापीदं सुखावहम् | भवत्यमुत्र चाक्षय्यं लोके5स्मिंश्व॒ यशस्करम्,पतिके हितके लिये किया हुआ मेरा वह प्राणोत्सर्गरूप कर्म आपके लिये तो सुखकारक होगा ही, मेरे लिये भी परलोकमें अक्षय सुखका साधक और इस लोकमें यशकी प्राप्ति करानेवाला होगा
স্বামীর হিতার্থে সেখানে আমার যে প্রাণত্যাগরূপ কর্ম হবে, তা তোমার জন্য তো সুখদায়ক হবেই; আমার জন্যও পরলোকে অক্ষয় সুখের কারণ হবে এবং এই লোকেও যশ বৃদ্ধি করবে।
ब्राह्मण उवाच