एकचक्रानिवासे ब्राह्मणगृहदुःखश्रवणम् | Hearing the Brāhmaṇa Household’s Distress at Ekacakrā
चरन् मार्गान् विजानाति नक्षत्रैविन्दते दिश: | आत्मना चात्मन: पञज्च पीडयन् नानुपीड्यते,“मनुष्य घूम-फिरकर रास्तेका पता लगा लेता है, नक्षत्रोंस दिशाओंको समझ लेता है तथा जो अपनी पाँचों इन्द्रियोंका स्वयं ही दमन करता है, वह शत्रुओंसे पीड़ित नहीं होता
caran mārgān vijānāti nakṣatrair vindate diśaḥ | ātmanā cātmanaḥ pañca pīḍayan nānupīḍyate ||
বৈশম্পায়ন বললেন—মানুষ ঘুরে-ফিরে পথ চিনে নেয়, নক্ষত্র দেখে দিক নির্ণয় করে। আর যে নিজের দ্বারা নিজের পাঁচ ইন্দ্রিয় সংযত রাখে, সে শত্রুদের দ্বারা পীড়িত হয় না।
वैशम्पायन उवाच