एकचक्रानिवासे ब्राह्मणगृहदुःखश्रवणम् | Hearing the Brāhmaṇa Household’s Distress at Ekacakrā
“जो शत्रुकी नीति-शास्त्रका अनुसरण करनेवाली बुद्धिको समझ लेता है, वह उसे समझ लेनेपर कोई ऐसा उपाय करे, जिससे वह यहाँ शत्रुजनित संकटसे बच सके ।। अलोहं निशितं शस्त्र शरीरपरिकर्तनम् । यो वेत्ति न तु त॑ घ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विष:,“एक ऐसा तीखा शस्त्र है, जो लोहेका बना तो नहीं है, परंतु शरीरको नष्ट कर देता है। जो उसे जानता है, ऐसे उस शस्त्रके आघातसे बचनेका उपाय जाननेवाले पुरुषको शत्रु नहीं मार सकतेः
aloham niśitaṁ śastraṁ śarīra-parikartanam | yo vetti na tu taṁ ghnanti pratighāta-vidaṁ dviṣaḥ ||
বৈশম্পায়ন বললেন—একটি অস্ত্র আছে, ধারালো; লোহার নয়, তবু দেহকে বিনষ্ট করে। যে তা চেনে এবং তার আঘাত প্রতিহত করার উপায় জানে, তাকে শত্রুরা নাশ করতে পারে না। অতএব যে শত্রুর নীতি ও কৌশল বোঝে, সে এখুনি এমন ব্যবস্থা নিক যাতে শত্রুজনিত বিপদ থেকে রক্ষা পায়।
वैशम्पायन उवाच