आदि पर्व (अध्याय १२७) — रङ्गे कर्णस्य अवमानः, दुर्योधनस्य प्रतिपक्ष-निवृत्तिः, मैत्री-स्थापनम् / Ādi Parva (Chapter 127) — Karṇa’s Public Humiliation, Duryodhana’s Intervention, and the Formation of Alliance
ततस्तु नगरात् तूर्णमाज्यगन्धपुरस्कृता: । निर्ह्वता: पावका दीप्ता: पाण्डो राजन् पुरोहितैः,राजन! तदनन्तर शीघ्र ही पाण्डुका दाह-संस्कार करनेके लिये पुरोहितगण घृत और सुगन्ध आदिके साथ प्रज्वलित अग्नि लिये नगरसे बाहर निकले
tatastu nagarāt tūṛṇam ājyagandhapuraskṛtāḥ | nirhūtāḥ pāvakā dīptāḥ pāṇḍo rājan purohitaiḥ ||
তদনন্তর, হে রাজন, পুরোহিতগণ ঘৃত ও সুগন্ধি দ্রব্য অগ্রে বহন করে, প্রজ্বলিত দীপ্ত অগ্নি সঙ্গে নিয়ে পাণ্ডুর অন্ত্যেষ্টিক্রিয়া সম্পাদনের জন্য দ্রুত নগর থেকে বাইরে বেরিয়ে গেলেন।
वैशम्पायन उवाच