Āstravidyā-Pradarśana: The Kuru Princes’ Public Demonstration of Arms (आस्त्रविद्या-प्रदर्शनम्)
बिभेम्यस्या: परिभवात् कुस्त्रीणां गतिरीदृशी । नाज्ञासिषमहं मूढा द्वन्द्धाह्माने फलद्धयम्,“अब तो मैं इसके द्वारा मेरा तिरस्कार न हो जाय, इस बातके लिये डरती हूँ। खोटी स्त्रियोंकी ऐसी ही गति होती है। मैं ऐसी मूर्खा हूँ कि मेरी समझमें यह बात नहीं आयी कि दो देवताओंके आवाहनसे दो पुत्ररूप फलकी प्राप्ति होती है। अत: राजन्! अब मुझे इसके लिये आप इस कार्यमें नियुक्त न कीजिये। मैं आपसे यही वर माँगती हूँ।” इस प्रकार पाण्डुके देवताओंके दिये हुए पाँच महाबली पुत्र उत्पन्न हुए, जो यशस्वी होनेके साथ ही कुरुकुलकी वृद्धि करनेवाले और उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थे। चन्द्रमाकी भाँति उनका दर्शन सबको प्रिय लगता था
bibhemy asyāḥ paribhavāt ku-strīṇāṁ gatir īdṛśī | nājñāsiṣam ahaṁ mūḍhā dvandvāhvāne phala-dvayam ||
বৈশম্পায়ন বললেন—কুন্তী বললেন—“আমি আশঙ্কা করি, তার (মাদ্রীর) অবমাননা আমার ওপর এসে পড়বে; কুচরিত্রা নারীদের পরিণতি এমনই হয়। আমি মূঢ়া বুঝতে পারিনি যে দুই দেবতাকে আহ্বান করলে ফলও দ্বিগুণ—দুই পুত্ররূপে—লাভ হয়। অতএব, রাজন, আমাকে আর এই কর্মে নিয়োজিত করবেন না; এই বরই আমি প্রার্থনা করি।” এভাবেই দেববরদানে পাণ্ডুর পাঁচ মহাবলী পুত্র জন্মাল—কীর্তিমান, কুরুবংশবর্ধক, শুভলক্ষণসম্পন্ন, এবং চন্দ্রের ন্যায় মনোহরদর্শন।
वैशम्पायन उवाच