पाण्डोः श्राद्धं, सत्यवत्याः वनगमनम्, बाल्यस्पर्धा च
Pāṇḍu’s Śrāddha, Satyavatī’s Withdrawal, and Childhood Rivalry
पाण्डुरुवाच यदि व्यवसितं होतद् युवयोर्धर्मसंहितम् । स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम्,पाण्डुने कहा--देवियो! यदि तुम दोनोंका यही धर्मयुक्त निश्चय है तो (ठीक है, मैं संन्यास न लेकर वानप्रस्थाश्रममें ही रहूँगा तथा) आजसे अपने पिता वेदव्यासजीकी अक्षय फलवाली जीवनचर्याका अनुसरण करूँगा
Pāṇḍur uvāca yadi vyavasitaṃ hotad yuvayor dharmasaṃhitam | svavṛttim anuvartiṣye tām ahaṃ pitur avyayām ||
পাণ্ডু বললেন—হে দেবীগণ! যদি তোমাদের দু’জনের এই সংকল্প ধর্মসম্মত ও দৃঢ় হয়, তবে আজ থেকে আমি আমার পিতার সেই অক্ষয় ফলদায়িনী জীবনবৃত্তিই অনুসরণ করব।
वैशम्पायन उवाच