Ādi Parva, Adhyāya 115 — Mādri’s request; invocation of the Aśvins; birth and naming of the Pāṇḍavas
सा चात्मनो मतं सत्यं शशंस परमर्षये । और उसने महर्षिको अपने मनकी बात सच-सच बता दी। गान्धायुवाच ज्येष्ठ कुन्तीसुतं जात॑ श्रुत्वा रविसमप्रभम्,इयं च मे मांसपेशी जाता पुत्रशताय वै | गान्धारीने कहा--मुने! मैंने सुना है, कुन्तीके एक ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ है, जो सूर्यके समान तेजस्वी है। यह समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखके कारण मैंने अपने उदरपर आघात करके गर्भ गिराया है। आपने पहले मुझे ही सौ पुत्र होनेका वरदान दिया था; परंतु आज इतने दिनों बाद मेरे गर्भसे सौ पुत्रोंकी जगह यह मांसपिण्ड पैदा हुआ है
sā cātmano mataṃ satyaṃ śaśaṃsa paramarṣaye | gāndhāry uvāca—jyeṣṭhaṃ kuntīsutaṃ jātaṃ śrutvā ravisamaprabham | iyaṃ ca me māṃsapeśī jātā putraśatāya vai ||
সে মহর্ষিকে নিজের মনের কথা সত্য করে জানাল। গন্ধারী বলল—“মুনে! আমি শুনেছি কুন্তীর জ্যেষ্ঠ পুত্র জন্মেছে, সূর্যের মতো দীপ্তিমান। এ সংবাদ শুনে দুঃখে বিদীর্ণ হয়ে আমি নিজের উদরে আঘাত করে গর্ভপাত ঘটিয়েছি। আপনি পূর্বে আমাকে শতপুত্রের বর দিয়েছিলেন; কিন্তু আজ এতদিন পরে শতপুত্রের বদলে আমার গর্ভ থেকে এই মাংসপিণ্ডই জন্মেছে।”
वैशम्पायन उवाच