पाण्डोः तपः-प्रसङ्गः, ऋण-धर्मः, अपत्य-प्राप्ति-चिन्ता
Pāṇḍu’s Asceticism, the Doctrine of Debts, and Deliberations on Progeny
सूर्य उवाच वेदाहं सर्वमेवैतद् यद् दुर्वासा वरं ददौ । संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां संगमो मम,सूर्यदेव बोले--शुभे! मैं यह सब जानता हूँ कि दुर्वासाने तुम्हें वर दिया है। तुम भय छोड़कर यहाँ मेरे साथ समागम करो
sūrya uvāca | vedāhaṃ sarvam evaitad yad durvāsā varaṃ dadau | saṃtyajya bhayam eveha kriyatāṃ saṅgamo mama ||
সূর্য বললেন—শুভে! দুর্বাসা যে তোমাকে বর দিয়েছেন, এ সবই আমি জানি। অতএব ভয় ত্যাগ করে এখানেই আমার সঙ্গে মিলনে সম্মতি দাও।
सूर्य उवाच