Pāṇḍu’s Marriages, Conquests, and Triumphal Return (पाण्डोर्विवाह-विजय-प्रत्यागमनम्)
धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचन हितम् | कौसल्ये धर्मतन्त्र॑ त्वां यद् ब्रवीमि निबोध तत्,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहनेके बाद महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ व्यासजी सत्यवतीसे फिर “अच्छा तो कौसल्या (ऋतु-स्नानके पश्चात) शुद्ध वस्त्र और शृंगार धारण करके शय्यापर मिलनकी प्रतीक्षा करे” यों कहकर अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर देवी सत्यवतीने एकान्तमें आयी हुई अपनी पुत्रवधू अम्बिकाके पास जाकर उससे (आपद्) धर्म और अर्थसे युक्त हितकारक वचन कहा--“कौसल्ये! मैं तुमसे जो धर्मसंगत बात कह रही हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो
vaiśampāyana uvāca |
dharmyam arthasamāyuktam uvāca vacanaṁ hitam |
kausalyē dharmatantre tvaṁ yad bravīmi nibodha tat ||
তিনি ধর্মসম্মত, অর্থসম্বন্ধীয় ও কল্যাণকর বাক্য বললেন— “হে কৌসল্যা, ধর্মশাসনে স্থিত থেকে আমি যা বলছি, মনোযোগ দিয়ে তা বুঝে নাও।”
वैशम्पायन उवाच