अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
न्यायशिक्षाचिकित्सा च दान॑ पाशुपतं तथा । हेतुनैव सम॑ जन्म दिव्यमानुषसंज्ञितम्,न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, दान तथा पाशुपत (अन्तर्यामीकी महिमा)-का भी इसमें विशद निरूपण है। साथ ही यह भी बतलाया गया है कि देवता, मनुष्य आदि भिन्न-भिन्न योनियोंमें जन्मका कारण क्या है?
nyāyaśikṣācikitsā ca dānaṃ pāśupataṃ tathā | hetunaiva samaṃ janma divyamānuṣasaṃjñitam ||
এখানে ন্যায়শাস্ত্র, শিক্ষা, চিকিৎসা, দানধর্ম এবং পাশুপত মত—ক্রম অনুসারে—বিশদভাবে ব্যাখ্যাত হয়েছে। তদুপরি ‘দিব্য’ ও ‘মানুষ’ প্রভৃতি নানা যোনিতে জন্মের কারণসমূহও স্পষ্ট করে বলা হয়েছে।