अनुक्रमणिकाध्यायः (Anukramaṇikā Adhyāya) — Invocation, Narrator Frame, and Textual Scope
राष्ट्रकी सम्पूर्ण प्रजा युधिष्ठिके शौचाचार, भीमसेनकी धृति, अर्जुनके विक्रम तथा नकुल-सहदेवकी गुरुशुश्रूषा, क्षमाशीलता और विनयसे बहुत ही प्रसन्न होती थी। सब लोग पाण्डवोंके शौर्यगुणसे संतोषका अनुभव करते थे- ।। समवाये ततो राज्ञां कन्यां भर्त॒स्वयंवराम् | प्राप्तवानर्जुन: कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम्,तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् राजाओंके समुदायमें अर्जुनने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके स्वयं ही पति चुननेवाली द्रुपदकन्या कृष्णाको प्राप्त किया
samavāye tato rājñāṃ kanyāṃ bhartṛ-svayaṃvarām | prāptavān arjunaḥ kṛṣṇāṃ kṛtvā karma suduṣkaram ||
তারপর রাজাদের মহাসভায়, অতি দুঃসাধ্য কর্ম সম্পন্ন করে, অর্জুন স্বয়ংবরায় স্বামী বেছে নেওয়া দ্রুপদকন্যা কৃষ্ণা (দ্রৌপদী)-কে লাভ করলেন।