Sage Kaṇḍu, Pramlocā’s Temptation, and Liberation at Puruṣottama
Brahma Purana Adhyaya 178Kaṇḍu Rishi and Pramlocā storyPuruṣottama Kṣetra Brahma Purana192 Shlokas

Adhyaya 178: Sage Kaṇḍu, Pramlocā’s Temptation, and Liberation at Puruṣottama

অধ্যায় ১৭৮ তপস্যার দুর্বলতা, দেবীয় হস্তক্ষেপ এবং তীর্থক্ষেত্রের মোক্ষদায়িনী মহিমা বিষয়ে উপদেশমূলক কাহিনি। ব্যাস গোমতীর নির্জন তীরে বেদজ্ঞ, সংযমী ঋষি কণ্ডুর কঠোর তপস্যা বর্ণনা করেন। তপস্তেজে ভীত ইন্দ্র (শক্র) কাম, বায়ু ও বসন্তের সহায়তায় অপ্সরা প্রম্লোচাকে পাঠিয়ে তাঁর ব্রহ্মচর্য ভঙ্গের চেষ্টা করেন। কণ্ডু মোহে পড়ে আচার-অনুষ্ঠান ত্যাগ করে শতাব্দীর পর শতাব্দী আসক্তিতে থাকেন, সময়ের গতি টের পান না। সত্য প্রকাশ পেলে তিনি তপঃক্ষয়ের জন্য নিজেকে নিন্দা করে প্রম্লোচাকে বিদায় দেন; বৃক্ষরক্ষিত স্বেদ/গর্ভ থেকে, বায়ু ও চন্দ্রের পোষণে মারিষার আশ্চর্য জন্মের কথা বলা হয়। পরে কণ্ডু দক্ষিণ সমুদ্রতটে পুরুষোত্তমক্ষেত্রে বিষ্ণুর ধামে গিয়ে ‘ব্রহ্মপার’ নামে একাগ্র জপ করেন, হরির দর্শন ও মোক্ষের আশ্বাস লাভ করে ইন্দ্রিয়সংযম ও অদ্বৈত ধ্যানের দ্বারা মুক্তি অর্জন করেন।

Chapter Arc

{"opening_hook":"Vyāsa introduces Kaṇḍu as a near-ideal tapasvin—Veda-versed, sense-restrained—kindling immediate suspense by placing him alone on the secluded Gomatī bank where austerity is said to ‘heat’ the three worlds.","rising_action":"Indra, fearing the power of tapas, deploys a classic purāṇic counter-force: Pramlocā aided by Kāma (desire), Vāyu (restless movement), and Vasanta (seasonal allure). Sensory beauty and subtle disturbance erode Kaṇḍu’s brahmacarya; he drops sandhyā, japa, homa, svādhyāya, and niyamas, and centuries pass unnoticed in attachment at Mandara-droṇī.","climax_moment":"The moral and theological pivot comes when Kaṇḍu awakens to the deception, laments the ruin of his tapas, yet refuses to curse Pramlocā—placing blame on his own unmastered senses—and then turns to the salvific geography of Puruṣottama-kṣetra, where his ‘brahmapāra’ japa and expansive stuti draw Hari’s direct darśana and mokṣa-assurance.","resolution":"The chapter closes with restoration through bhakti and jñāna: Kaṇḍu regains equanimity, restrains the senses, contemplates the nirguṇa/nirlepa Puruṣottama, and attains supreme liberation; a phalaśruti adds that hearing/reciting this account purifies and leads to heavenly ascent.","key_verse":"Teaching (sense-control + refuge in Puruṣottama): “Not another is to be blamed—my own senses, ungoverned, became the cause of my fall. Taking refuge in Puruṣottama, and fixing the mind on Hari beyond guṇas, one attains the highest release.” (rendered summary-translation of the chapter’s central instruction)"}

Thematic Essence

{"primary_theme":"Puruṣottama-kṣetra as mokṣa-giving refuge after ascetic fall (tīrtha-soteriology).","secondary_themes":["Ascetic vulnerability: tapas without vigilant indriya-nigraha is unstable","Indra’s obstruction motif: deva-fear of tapas as a purāṇic test-pattern","Accountability over scapegoating: Kaṇḍu blames his senses, not Pramlocā","Mythic genealogy: Māriṣā’s wondrous birth and linkage to Dakṣa-lineage"],"brahma_purana_doctrine":"Puruṣottama on the southern ocean shore is presented as rare, wish-fulfilling, and explicitly muktida: concentrated japa and bhakti there, joined to nirguṇa contemplation, overrides even severe spiritual loss and culminates in mokṣa.","adi_purana_significance":"As ‘Ādi Purāṇa,’ the chapter models a foundational purāṇic pedagogy: (1) tapas is powerful yet precarious, (2) bhakti-centered tīrtha is a universal corrective, and (3) cosmic genealogy and sacred geography are woven into a single salvation narrative."}

Emotional Journey

{"opening_rasa":"शान्त","climax_rasa":"अद्भुत","closing_rasa":"शान्त","rasa_transitions":["शान्त → रौद्र (Indra’s anxious opposition) → शृङ्गार (temptation) → करुण (Kaṇḍu’s remorse) → अद्भुत (Hari-darśana) → शान्त (mokṣa)"],"devotional_peaks":["Kaṇḍu’s ‘brahmapāra’ japa at Puruṣottama","The expansive stuti identifying Hari with kāla, bhūtas, and Veda","Hari’s boon discourse elevating bhakti as accessible to all and mokṣa-bestowing"]}

Tirtha Focus

{"tirthas_covered":["गोमती नदी (Gomatī riverbank)","पुरुषोत्तमक्षेत्र (Puruṣottama-kṣetra)","दक्षिणोदधितीर (southern ocean shore)"],"jagannath_content":"Puruṣottama is praised as a rare, muktida Viṣṇu-āyatana on the southern seacoast; the emphasis is on darśana, japa, and liberation-granting power of the kṣetra (a core Puri/Jagannātha-zone valuation, even when Jagannātha is not foregrounded by name).","surya_content":null,"cosmology_content":"Stuti-material briefly universalizes Viṣṇu as the ground of time, elements, and Vedic order—cosmology invoked as theology rather than as a full sarga/pralaya account."}

Shlokas in Adhyaya 178

Verse 1

व्यास उवाच तस्मिन् क्षेत्रे मुनिश्रेष्ठाः सर्वसत्त्वसुखावहे धर्मार्थकाममोक्षाणां फलदे पुरुषोत्तमे //

এটি অধ্যায় ১৭৮-এর প্রথম শ্লোক।

Verse 2

कण्डुर् नाम महातेजा ऋषिः परमधार्मिकः सत्यवादी शुचिर् दान्तः सर्वभूतहिते रतः //

এটি দ্বিতীয় শ্লোক; পবিত্র পুরাণবচন, যা ধর্মার্থকে স্পষ্টভাবে প্রকাশ করে।

Verse 3

जितेन्द्रियो जितक्रोधो वेदवेदाङ्गपारगः अवाप परमां सिद्धिम् आराध्य पुरुषोत्तमम् //

এটি তৃতীয় শ্লোক; পুরাণে ধর্মের বিস্তারকে শ্রদ্ধার সঙ্গে নিরূপণ করে।

Verse 4

अन्ये ऽपि तत्र संसिद्धा मुनयः संशितव्रताः सर्वभूतहिता दान्ता जितक्रोधा विमत्सराः //

এটি চতুর্থ শ্লোক; শাস্ত্রার্থ সংক্ষেপে ধারণ করে পবিত্র বাণী উচ্চারণ করে।

Verse 5

मुनय ऊचुः को ऽसौ कण्डुः कथं तत्र जगाम परमां गतिम् श्रोतुम् इच्छामहे तस्य चरितं ब्रूहि सत्तम //

এটি পঞ্চম শ্লোক; পুরাণধর্মের সার শ্রোতাদের কল্যাণার্থে প্রদর্শন করে।

Verse 6

व्यास उवाच शृणुध्वं मुनिशार्दूलाः कथां तस्य मनोहराम् प्रवक्ष्यामि समासेन मुनेस् तस्य विचेष्टितम् //

এটি ষষ্ঠ শ্লোক; পুণ্যদায়ক জ্ঞান দিয়ে মোক্ষপথের নির্দেশ করে।

Verse 7

पवित्रे गोमतीतीरे विजने सुमनोहरे कन्दमूलफलैः पूर्णे समित्पुष्पकुशान्वितैः //

সপ্তম শ্লোক—এখানে মূলপাঠ কেবল “7”; প্রকৃত শ্লোক না থাকায় অর্থানুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 8

नानाद्रुमलताकीर्णे नानापुष्पोपशोभिते नानापक्षिरुते रम्ये नानामृगगणान्विते //

অষ্টম শ্লোক—এখানে মূলপাঠ কেবল “8”; প্রকৃত শ্লোক না থাকায় অর্থানুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 9

तत्राश्रमपदं कण्डोर् बभूव मुनिसत्तमाः सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं कदलीखण्डमण्डितम् //

নবম শ্লোক—এখানে মূলপাঠ কেবল “9”; প্রকৃত শ্লোক না থাকায় অর্থানুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 10

तपस् तेपे मुनिस् तत्र सुमहत् परमाद्भुतम् व्रतोपवासैर् नियमैः स्नानमौनसुसंयमैः //

দশম শ্লোক—এখানে মূলপাঠ কেবল “10”; প্রকৃত শ্লোক না থাকায় অর্থানুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 11

ग्रीष्मे पञ्चतपा भूत्वा वर्षासु स्थण्डिलेशयः आर्द्रवासास् तु हेमन्ते स तेपे सुमहत् तपः //

একাদশ শ্লোক—এখানে মূলপাঠ কেবল “11”; প্রকৃত শ্লোক না থাকায় অর্থানুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 12

दृष्ट्वा तु तपसो वीर्यं मुनेस् तस्य सुविस्मिताः बभूवुर् देवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास् तथा //

দ্বাদশ শ্লোক—এখানে মূল শ্লোকটি দেওয়া নেই; তাই কেবল ‘12’ সংখ্যাসূচক চিহ্ন দেখা যায়।

Verse 13

भूमिं तथान्तरिक्षं च दिवं च मुनिसत्तमाः कण्डुः संतापयाम् आस त्रैलोक्यं तपसो बलात् //

ত্রয়োদশ শ্লোক—এখানে মূল শ্লোক অনুপস্থিত; কেবল ‘13’ সংখ্যার ইঙ্গিত আছে।

Verse 14

अहो ऽस्य परमं धैर्यम् अहो ऽस्य परमं तपः इत्य् अब्रुवंस् तदा दृष्ट्वा देवास् तं तपसि स्थितम् //

চতুর্দশ শ্লোক—এখানে মূল পাঠ দেওয়া হয়নি; কেবল ‘14’ সংখ্যার চিহ্ন আছে।

Verse 15

मन्त्रयाम् आसुर् अव्यग्राः शक्रेण सहितास् तदा भयात् तस्य समुद्विग्नास् तपोविघ्नम् अभीप्सवः //

পঞ্চদশ শ্লোক—এখানে শ্লোকের মূল বাক্য নেই; কেবল ‘15’ সংখ্যাটি প্রদর্শিত।

Verse 16

ज्ञात्वा तेषाम् अभिप्रायं शक्रस् त्रिभुवनेश्वरः प्रम्लोचाख्यां वरारोहां रूपयौवनगर्विताम् //

ষোড়শ শ্লোক—এখানে মূল শ্লোকপাঠ দেখা যায় না; কেবল ‘16’ সংখ্যার চিহ্ন উপলব্ধ।

Verse 17

सुमध्यां चारुजङ्घां तां पीनश्रोणिपयोधराम् सर्वलक्षणसंपन्नां प्रोवाच फलसूदनः //

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Verse 18

शक्र उवाच प्रम्लोचे गच्छ शीघ्रं त्वं यदासौ तप्यते मुनिः विघ्नार्थं तस्य तपसः क्षोभयस्वांशु सुप्रभे //

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Verse 19

प्रम्लोचोवाच तव वाक्यं सुरश्रेष्ठ करोमि सततं प्रभो किंतु शङ्का ममैवात्र जीवितस्य च संशयः //

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Verse 20

बिभेमि तं मुनिवरं ब्रह्मचर्यव्रते स्थितम् अत्युग्रं दीप्ततपसं ज्वलनार्कसमप्रभम् //

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Verse 21

ज्ञात्वा मां स मुनिः क्रोधाद् विघ्नार्थं समुपागताम् कण्डुः परमतेजस्वी शापं दास्यति दुःसहम् //

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Verse 22

उर्वशी मेनका रम्भा घृताची पुञ्जिकस्थला विश्वाची सहजन्या च पूर्वचित्तिस् तिलोत्तमा //

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Verse 23

अलम्बुषा मिश्रकेशी शशिलेखा च वामना अन्याश् चाप्सरसः सन्ति रूपयौवनगर्विताः //

এই শ্লোকের মূল পাঠ অনুপস্থিত; তাই ভাবার্থসহ অনুবাদ করা যাচ্ছে না। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি লিখুন।

Verse 24

सुमध्याश् चारुवदनाः पीनोन्नतपयोधराः कामप्रधानकुशलास् तास् तत्र संनियोजय //

সংস্কৃত মূল ছাড়া অনুবাদ যথাযথ নয়; অনুগ্রহ করে ১৭৮.২৪ শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 25

ब्रह्मोवाच तस्यास् तद् वचनं श्रुत्वा पुनः प्राह शचीपतिः तिष्ठन्तु नाम चान्यास् तास् त्वं चात्र कुशला शुभे //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; তাই প্রামাণ্য অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।

Verse 26

कामं वसन्तं वायुं च सहायार्थे ददामि ते तैः सार्धं गच्छ सुश्रोणि यत्रास्ते स महामुनिः //

১৭৮.২৬ শ্লোকের মূল পাঠ ছাড়া অর্থ নির্ণয় সম্ভব নয়; অনুগ্রহ করে সংস্কৃত শ্লোক দিন।

Verse 27

शक्रस्य वचनं श्रुत्वा तदा सा चारुलोचना जगामाकाशमार्गेण तैः सार्धं चाश्रमं मुनेः //

এখানে শ্লোকের পাঠ নির্দেশিত; এর অর্থ প্রসঙ্গানুসারে জ্ঞেয়।

Verse 28

गत्वा सा तत्र रुचिरं ददर्श वनम् उत्तमम् मुनिं च दीप्ततपसम् आश्रमस्थम् अकल्मषम् //

এখানে কেবল শ্লোক-সংখ্যা দেখা যায়; মূলপাঠ পেলে তবেই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব।

Verse 29

अपश्यत् सा वनं रम्यं तैः सार्धं नन्दनोपमम् सर्वर्तुवरपुष्पाढ्यं शाखामृगगणाकुलम् //

মূল শ্লোক এখানে দেওয়া নেই; তাই নিশ্চিতভাবে ভাবানুবাদ করা যায় না।

Verse 30

पुण्यं पद्मबलोपेतं सपल्लवमहाबलम् श्रोत्ररम्यान् सुमधुराञ् शब्दान् खगमुखेरितान् //

যখন মূলপাঠ দেওয়া হবে, তখন তার পবিত্র অর্থ যথাশক্তি অনূদিত হবে।

Verse 31

सर्वर्तुफलभाराढ्यान् सर्वर्तुकुसुमोज्ज्वलान् अपश्यत् पादपांश् चैव विहंगैर् अनुनादितान् //

অতএব অনুগ্রহ করে শ্লোকের মূল বাক্য দিন; তবেই যথার্থ অনুবাদ সম্পন্ন হবে।

Verse 32

आम्रान् आम्रातकान् भव्यान् नारिकेरान् सतिन्दुकान् अथ बिल्वांस् तथा जीवान् दाडिमान् बीजपूरकान् //

এখানে মূল শ্লোকটি দেওয়া নেই; শুধু “৩২” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত পাঠ দিন, তবেই যথার্থ অনুবাদ করা যাবে।

Verse 33

पनसांल् लकुचान् नीपाञ् शिरीषान् सुमनोहरान् पारावतांस् तथा कोलान् अरिमेदाम्लवेतसान् //

এখানে মূল শ্লোকটি দেওয়া নেই; শুধু “৩৩” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত পাঠ দিন, তবেই যথার্থ অনুবাদ করা যাবে।

Verse 34

भल्लातकान् आमलकाञ् शतपर्णांश् च किंशुकान् इङ्गुदान् करवीरांश् च हरीतकीविभीतकान् //

এখানে মূল শ্লোকটি দেওয়া নেই; শুধু “৩৪” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত পাঠ দিন, তবেই যথার্থ অনুবাদ করা যাবে।

Verse 35

एतान् अन्यांश् च सा वृक्षान् ददर्श पृथुलोचना तथैवाशोकपुंनागकेतकीबकुलान् अथ //

এখানে মূল শ্লোকটি দেওয়া নেই; শুধু “৩৫” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত পাঠ দিন, তবেই যথার্থ অনুবাদ করা যাবে।

Verse 36

पारिजातान् कोविदारान् मन्दारेन्दीवरांस् तथा पाटलाः पुष्पिता रम्या देवदारुद्रुमांस् तथा //

এখানে মূল শ্লোকটি দেওয়া নেই; শুধু “৩৬” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত পাঠ দিন, তবেই যথার্থ অনুবাদ করা যাবে।

Verse 37

शालांस् तालांस् तमालांश् च निचुलांल् लोमकांस् तथा अन्यांश् च पादपश्रेष्ठान् अपश्यत् फलपुष्पितान् //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; কেবল “37” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোক-পাঠ দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করা হবে।

Verse 38

चकोरैः शतपत्त्रैश् च भृङ्गराजैस् तथा शुकैः कोकिलैः कलविङ्कैश् च हारीतैर् जीवजीवकैः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; কেবল “38” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন, তারপর পবিত্র ভাবানুসারে অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 39

प्रियपुत्रैश् चातकैश् च तथान्यैर् विविधैः खगैः श्रोत्ररम्यं सुमधुरं कूजद्भिश् चाप्य् अधिष्ठितम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; শুধু “39” আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোক-পাঠ দিন, তাহলে যথার্থ অনুবাদ করা হবে।

Verse 40

सरांसि च मनोज्ञानि प्रसन्नसलिलानि च कुमुदैः पुण्डरीकैश् च तथा नीलोत्पलैः शुभैः //

এখানে কেবল “40” সংখ্যা আছে; শ্লোক-পাঠ অনুপস্থিত। অনুগ্রহ করে মূল সংস্কৃত দিন, তাহলে ধর্মসম্মত অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 41

कह्लारैः कमलैश् चैव आचितानि समन्ततः कादम्बैश् चक्रवाकैश् च तथैव जलकुक्कुटैः //

এই শ্লোকের মূল পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “41” আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত শ্লোক দিন, তাহলে শ্রদ্ধাসহ অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 42

कारण्डवैर् बकैर् हंसैः कूर्मैर् मद्गुभिर् एव च एतैश् चान्यैश् च कीर्णानि समन्ताज् जलचारिभिः //

এখানে কেবল “42” সংখ্যা দেওয়া আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 43

क्रमेणैव तथा सा तु वनं बभ्राम तैः सह एवं दृष्ट्वा वनं रम्यं तैः सार्धं परमाद्भुतम् //

এখানে কেবল “43” সংখ্যা দেওয়া আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 44

विस्मयोत्फुल्लनयना सा बभूव वराङ्गना प्रोवाच वायुं कामं च वसन्तं च द्विजोत्तमाः //

এখানে কেবল “44” সংখ্যা দেওয়া আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 45

प्रम्लोचोवाच कुरुध्वं मम साहाय्यं यूयं सर्वे पृथक् पृथक् //

এখানে কেবল “45” সংখ্যা দেওয়া আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 46

ब्रह्मोवाच एवम् उक्त्वा तदा सा तु तथेत्य् उक्ता सुरैर् द्विजाः प्रत्युवाचाद्य यास्यामि यत्रासौ संस्थितो मुनिः //

এখানে কেবল “46” সংখ্যা দেওয়া আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 47

अद्य तं देहयन्तारं प्रयुक्तेन्द्रियवाजिनम् स्मरशस्त्रगलद्रश्मिं करिष्यामि कुसारथिम् //

এখানে কেবল ‘৪৭’ সংখ্যা আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই যথার্থ অনুবাদ করা যায় না।

Verse 48

ब्रह्मा जनार्दनो वापि यदि वा नीललोहितः तथाप्य् अद्य करिष्यामि कामबाणक्षतान्तरम् //

এখানে শুধু ‘৪৮’ সংখ্যা আছে; মূল শ্লোক নেই, তাই অনুবাদ দেওয়া সম্ভব নয়।

Verse 49

इत्य् उक्त्वा प्रययौ साथ यत्रासौ तिष्ठते मुनिः मुनेस् तपःप्रभावेण प्रशान्तश्वापदाश्रमम् //

এখানে কেবল ‘৪৯’ সংখ্যা দেখা যায়; শ্লোকপাঠ না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 50

सा पुंस्कोकिलमाधुर्ये नदीतीरे व्यवस्थिता स्तोकमात्रं स्थिता तस्माद् अगायत वराप्सराः //

এখানে শ্লোক দেওয়া নেই, শুধু ‘৫০’ সংখ্যা; তাই অনুবাদ দেওয়া সম্ভব নয়।

Verse 51

ततो वसन्तः सहसा बलं समकरोत् तदा कोकिलारावमधुरम् अकालिकमनोहरम् //

এখানে শুধু ‘৫১’ সংখ্যা দেখানো হয়েছে; শ্লোকপাঠ না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 52

ववौ गन्धवहश् चैव मलयाद्रिनिकेतनः पुष्पान् उच्चावचान् मेध्यान् पातयंश् च शनैः शनैः //

এখানে ‘বায়ান্ন’ শ্লোক-সংখ্যার নির্দেশ আছে; মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই।

Verse 53

पुष्पबाणधरश् चैव गत्वा तस्य समीपतः मुनेश् च क्षोभयाम् आस कामस् तस्यापि मानसम् //

এখানে ‘তিরিপ্পান্ন’ শ্লোক-সংখ্যার ইঙ্গিত আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত।

Verse 54

ततो गीतध्वनिं श्रुत्वा मुनिर् विस्मितमानसः जगाम यत्र सा सुभ्रूः कामबाणप्रपीडितः //

এখানে ‘চুয়ান্ন’ শ্লোক-সংখ্যা আছে; মূল পাঠ পাওয়া যায় না।

Verse 55

दृष्ट्वा ताम् आह संदृष्टो विस्मयोत्फुल्ललोचनः भ्रष्टोत्तरीयो विकलः पुलकाञ्चितविग्रहः //

এখানে ‘পঞ্চান্ন’ শ্লোক-সংখ্যা আছে; শ্লোকের বাক্য দেওয়া নেই।

Verse 56

ऋषिर् उवाच कासि कस्यासि सुश्रोणि सुभगे चारुहासिनि मनो हरसि मे सुभ्रु ब्रूहि सत्यं सुमध्यमे //

এখানে ‘ছাপ্পান্ন’ শ্লোক-সংখ্যা আছে; মূল শ্লোক-পাঠ অনুপস্থিত।

Verse 57

प्रम्लोचोवाच तव कर्मकरा चाहं पुष्पार्थम् अहम् आगता आदेशं देहि मे क्षिप्रं किं करोमि तवाज्ञया //

এখানে ৫৭তম শ্লোক নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অর্থানুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 58

व्यास उवाच श्रुत्वैवं वचनं तस्यास् त्यक्त्वा धैर्यं विमोहितः आदाय हस्ते तां बालां प्रविवेश स्वम् आश्रमम् //

এখানে ৫৮তম শ্লোক নির্দেশিত; মূলপাঠ না থাকায় অর্থব্যাখ্যা/অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 59

ततः कामश् च वायुश् च वसन्तश् च द्विजोत्तमाः जग्मुर् यथागतं सर्वे कृतकृत्यास् त्रिविष्टपम् //

এখানে ৫৯তম শ্লোক নির্দেশিত; পাঠ না পাওয়ায় অনুবাদ করা যায় না।

Verse 60

शशंसुश् च हरिं गत्वा तस्यास् तस्य च चेष्टितम् श्रुत्वा शक्रस् तदा देवाः प्रीताः सुमनसो ऽभवन् //

এখানে ৬০তম শ্লোক নির্দেশিত; মূল শ্লোক না থাকায় ভাবার্থ দেওয়া যায় না।

Verse 61

स च कण्डुस् तया सार्धं प्रविशन्न् एव चाश्रमम् आत्मनः परमं रूपं चकार मदनाकृति //

এখানে ৬১তম শ্লোক নির্দেশিত; পাঠের অভাবে যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 62

रूपयौवनसंपन्नम् अतीव सुमनोहरम् दिव्यालंकारसंयुक्तं षोडशवत्सराकृति //

এটি ১৭৮ অধ্যায়ের বাষট্টিতম শ্লোক।

Verse 63

दिव्यवस्त्रधरं कान्तं दिव्यस्रग्गन्धभूषितम् सर्वोपभोगसंपन्नं सहसा तपसो बलात् //

এটি ১৭৮ অধ্যায়ের তেষট্টিতম শ্লোক।

Verse 64

दृष्ट्वा सा तस्य तद् वीर्यं परं विस्मयम् आगता अहो ऽस्य तपसो वीर्यम् इत्य् उक्त्वा मुदिताभवत् //

এটি ১৭৮ অধ্যায়ের চৌষট্টিতম শ্লোক।

Verse 65

स्नानं संध्यां जपं होमं स्वाध्यायं देवतार्चनम् व्रतोपवासनियमं ध्यानं च मुनिसत्तमाः //

এটি ১৭৮ অধ্যায়ের পঁয়ষট্টিতম শ্লোক।

Verse 66

त्यक्त्वा स रेमे मुदितस् तया सार्धम् अहर्निशम् मन्मथाविष्टहृदयो न बुबोध तपःक्षयम् //

এটি ১৭৮ অধ্যায়ের ছেষট্টিতম শ্লোক।

Verse 67

संध्यारात्रिदिवापक्षमासर्त्वयनहायनम् न बुबोध गतं कालं विषयासक्तमानसः //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “67” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন, তাহলে শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ করা হবে।

Verse 68

सा च तं कामजैर् भावैर् विदग्धा रहसि द्विजाः वरयाम् आस सुश्रोणिः प्रलापकुशला तदा //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “68” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন, তাহলে শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ করা হবে।

Verse 69

एवं कण्डुस् तया सार्धं वर्षाणाम् अधिकं शतम् अतिष्ठन् मन्दरद्रोण्यां ग्राम्यधर्मरतो मुनिः //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “69” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন, তাহলে শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ করা হবে।

Verse 70

सा तं प्राह महाभागं गन्तुम् इच्छाम्य् अहं दिवम् प्रसादसुमुखो ब्रह्मन्न् अनुज्ञातुं त्वम् अर्हसि //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “70” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন, তাহলে শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ করা হবে।

Verse 71

तयैवम् उक्तः स मुनिस् तस्याम् आसक्तमानसः दिनानि कतिचिद् भद्रे स्थीयताम् इत्य् अभाषत //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “71” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন, তাহলে শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ করা হবে।

Verse 72

एवम् उक्ता ततस् तेन साग्रं वर्षशतं पुनः बुभुजे विषयांस् तन्वी तेन सार्धं महात्मना //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৭২; এই পদের মূল পাঠ এখানে কেবল সংখ্যারূপে নির্দেশিত।

Verse 73

अनुज्ञां देहि भगवन् व्रजामि त्रिदशालयम् उक्तस् तयेति स पुनः स्थीयताम् इत्य् अभाषत //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৭৩; এই পদের মূল পাঠ এখানে কেবল সংখ্যারূপে নির্দেশিত।

Verse 74

पुनर् गते वर्षशते साधिके सा शुभानना याम्य् अहं त्रिदिवं ब्रह्मन् प्रणयस्मितशोभनम् //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৭৪; এই পদের মূল পাঠ এখানে কেবল সংখ্যারূপে নির্দেশিত।

Verse 75

उक्तस् तयैवं स मुनिः पुनर् आहायतेक्षणाम् इहास्यतां मया सुभ्रु चिरं कालं गमिष्यसि //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৭৫; এই পদের মূল পাঠ এখানে কেবল সংখ্যারূপে নির্দেশিত।

Verse 76

तच्छापभीता सुश्रोणी सह तेनर्षिणा पुनः शतद्वयं किंचिद् ऊनं वर्षाणां समतिष्ठत //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৭৬; এই পদের মূল পাঠ এখানে কেবল সংখ্যারূপে নির্দেশিত।

Verse 77

गमनाय महाभागो देवराजनिवेशनम् प्रोक्तः प्रोक्तस् तया तन्व्या स्थीयताम् इत्य् अभाषत //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু ‘৭৭’ সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তারপর যথাযথ অনুবাদ করা হবে।

Verse 78

तस्य शापभयाद् भीरुर् दाक्षिण्येन च दक्षिणा प्रोक्ता प्रणयभङ्गार्तिवेदिनी न जहौ मुनिम् //

এখানে শ্লোকের মূল পাঠ নেই; শুধু ‘৭৮’ লেখা আছে। অনুগ্রহ করে সংস্কৃত শ্লোক দিন, তারপর যথাযথ অনুবাদ দেব।

Verse 79

तया च रमतस् तस्य परमर्षेर् अहर्निशम् नवं नवम् अभूत् प्रेम मन्मथासक्तचेतसः //

এই শ্লোকের সংস্কৃত মূল পাঠ নেই; শুধু ‘৭৯’ সংখ্যা আছে। মূল পাঠ দিন, তারপর অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 80

एकदा तु त्वरायुक्तो निश्चक्रामोटजान् मुनिः निष्क्रामन्तं च कुत्रेति गम्यते प्राह सा शुभा //

এখানে শুধু ‘৮০’ দেখা যাচ্ছে; শ্লোক-পাঠ নেই। অনুগ্রহ করে ব্রহ্মপুরাণের সম্পূর্ণ শ্লোকটি লিখে দিন।

Verse 81

इत्य् उक्तः स तया प्राह परिवृत्तम् अहः शुभे संध्योपास्तिं करिष्यामि क्रियालोपो ऽन्यथा भवेत् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু ‘৮১’ আছে। মূল শ্লোক দিন, তারপর সব ভাষায় অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 82

ततः प्रहस्य मुदिता सा तं प्राह महामुनिम् किम् अद्य सर्वधर्मज्ञ परिवृत्तम् अहस् तव गतम् एतन् न कुरुते विस्मयं कस्य कथ्यते //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৮২; মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই, তাই এখানে কেবল শ্লোক-সংকেত রাখা হলো।

Verse 83

मुनिर् उवाच प्रातस् त्वम् आगता भद्रे नदीतीरम् इदं शुभम् मया दृष्टासि सुश्रोणि प्रविष्टा च ममाश्रमम् //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৮৩; মূল পাঠ না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়, তাই কেবল শ্লোক-সংকেত দেওয়া হলো।

Verse 84

इयं च वर्तते संध्या परिणामम् अहो गतम् अवहासः किमर्थो ऽयं सद्भावः कथ्यतां मम //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৮৪; মূল পাঠ ছাড়া অর্থানুবাদ করা যায় না, তাই কেবল শ্লোক-সংখ্যা উল্লেখ করা হলো।

Verse 85

प्रम्लोचोवाच प्रत्यूषस्य् आगता ब्रह्मन् सत्यम् एतन् न मे मृषा किंत्व् अद्य तस्य कालस्य गतान्य् अब्दशतानि ते //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৮৫; মূল শ্লোক না থাকায় অনুবাদ দেওয়া সম্ভব নয়, তাই কেবল নির্দেশ রাখা হলো।

Verse 86

ततः ससाध्वसो विप्रस् तां पप्रच्छायतेक्षणाम् कथ्यतां भीरु कः कालस् त्वया मे रमतः सदा //

অধ্যায় ১৭৮-এর শ্লোক ৮৬; মূল পাঠ ছাড়া শাস্ত্রীয় অর্থ অনুবাদ করা যায় না, তাই কেবল শ্লোক-সংকেত আছে।

Verse 87

प्रम्लोचोवाच सप्तोत्तराण्य् अतीतानि नववर्षशतानि च मासाश् च षट् तथैवान्यत् समतीतं दिनत्रयम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 88

ऋषिर् उवाच सत्यं भीरु वदस्य् एतत् परिहासो ऽथवा शुभे दिनम् एकम् अहं मन्ये त्वया सार्धम् इहोषितम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত; তাই প্রামাণ্য অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।

Verse 89

प्रम्लोचोवाच वदिष्याम्य् अनृतं ब्रह्मन् कथम् अत्र तवान्तिके विशेषाद् अद्य भवता पृष्टा मार्गानुगामिना //

এখানে শ্লোকের সংস্কৃত মূল দেওয়া নেই; তাই ভাবানুবাদও নিশ্চিতভাবে সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি লিখুন।

Verse 90

व्यास उवाच निशम्य तद् वचस् तस्याः स मुनिर् द्विजसत्तमाः धिग् धिङ् माम् इत्य् अनाचारं विनिन्द्यात्मानम् आत्मना //

শ্লোকের মূল পাঠ না থাকলে অনুবাদ যথাযথ নয়; অনুগ্রহ করে ব্রহ্মপুরাণের শ্লোকটি সঠিকভাবে দিন।

Verse 91

मुनिर् उवाच तपांसि मम नष्टानि हतं ब्रह्मविदां धनम् हृतो विवेकः केनापि योषिन् मोहाय निर्मिता //

শ্লোকের পাঠ পেলেই আমি তার অর্থ পনেরো ভাষায় যথাসাধ্য অনুবাদ করব; এখন পাঠটি দেখা যাচ্ছে না।

Verse 94

च् देवराजस्य यत् क्षोभं कुर्वन्त्या भावचेष्टितैः

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “৯৪” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 95

द् न त्वां करोम्य् अहं भस्म क्रोधतीव्रेण वह्निना सतां साप्तपदं मैत्र्यम् उषितो ऽहं त्वया सह //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “৯৫” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 96

अथवा तव दोषः कः किं वा कुर्याम् अहं तव ममैव दोषो नितरां येनाहम् अजितेन्द्रियः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “৯৬” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 97

यथा शक्रप्रियार्थिन्या कृतो मत्तपसो व्ययः त्वया दृष्टिमहामोहमनुनाहं जुगुप्सितः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “৯৭” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 98

व्यास उवाच यावद् इत्थं स विप्रर्षिस् तां ब्रवीति सुमध्यमाम् तावत् स्खलत्स्वेदजला सा बभूवातिवेपथुः //

এটি ১৭৮.৯৮ শ্লোক-সংখ্যা; মূল সংস্কৃত পাঠ না থাকায় অনুবাদ করা যাচ্ছে না।

Verse 99

प्रवेपमानां स च तां स्विन्नगात्रलतां सतीम् गच्छ गच्छेति सक्रोधम् उवाच मुनिसत्तमः //

এটি ১৭৮.৯৯ শ্লোক-সংখ্যা; মূল শ্লোক না থাকায় অনুবাদ দেওয়া সম্ভব নয়।

Verse 100

सा तु निर्भर्त्सिता तेन विनिष्क्रम्य तदाश्रमात् आकाशगामिनी स्वेदं ममार्ज तरुपल्लवैः //

এটি ১৭৮.১০০ শ্লোক-সংখ্যা; মূল পাঠ না থাকায় অর্থানুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 101

वृक्षाद् वृक्षं ययौ बाला उदग्रारुणपल्लवैः निर्ममार्ज च गात्राणि गलत्स्वेदजलानि वै //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “১০১” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 102

ऋषिणा यस् तदा गर्भस् तस्या देहे समाहितः निर्जगाम सरोमाञ्चस्वेदरूपी तदङ्गतः //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১০২ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অর্থানুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 103

तं वृक्षा जगृहुर् गर्भम् एकं चक्रे च मारुतः सोमेनाप्यायितो गोभिः स तदा ववृद्धे शनैः //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১০৩ নির্দেশিত; মূল শ্লোক অনুপস্থিত, তাই অনুবাদ করা যায় না।

Verse 104

मारिषा नाम कन्याभूद् वृक्षाणां चारुलोचना प्राचेतसानां सा भार्या दक्षस्य जननी द्विजाः //

এখানে কেবল শ্লোকসংখ্যা ১০৪ দেওয়া আছে; পাঠ না থাকায় অর্থব্যাখ্যা সম্ভব নয়।

Verse 105

स चापि भगवान् कण्डुः क्षीणे तपसि सत्तमः पुरुषोत्तमाख्यं भो विप्रा विष्णोर् आयतनं ययौ //

এখানে ১০৫ শ্লোকাঙ্ক দেখানো হয়েছে; মূল গ্রন্থপাঠ নেই, তাই অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 106

ददर्श परमं क्षेत्रं मुक्तिदं भुवि दुर्लभम् दक्षिणस्योदधेस् तीरे सर्वकामफलप्रदम् //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১০৬ নির্দিষ্ট; মূল শ্লোকপাঠ না থাকলে পবিত্র অর্থানুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 107

सुरम्यं वालुकाकीर्णं केतकीवनशोभितम् नानाद्रुमलताकीर्णं नानापक्षिरुतं शिवम् //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১০৭ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 108

सर्वत्र सुखसंचारं सर्वर्तुकुसुमान्वितम् सर्वसौख्यप्रदं नॄणां धन्यं सर्वगुणाकरम् //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১০৮ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 109

भृग्वाद्यैः सेवितं पूर्वं मुनिसिद्धवरैस् तथा गन्धर्वैः किंनरैर् यक्षैस् तथान्यैर् मोक्षकाङ्क्षिभिः //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১০৯ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 110

ददर्श च हरिं तत्र देवैः सर्वैर् अलंकृतम् ब्राह्मणाद्यैस् तथा वर्णैर् आश्रमस्थैर् निषेवितम् //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১১০ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 111

दृष्ट्वैव स तदा क्षेत्रं देवं च पुरुषोत्तमम् कृतकृत्यम् इवात्मानं मेने स मुनिसत्तमः //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১১১ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত, তাই অনুবাদ করা সম্ভব নয়।

Verse 112

तत्रैकाग्रमना भूत्वा चकाराराधनं हरेः ब्रह्मपारमयं कुर्वञ् जपम् एकाग्रमानसः ऊर्ध्वबाहुर् महायोगी स्थित्वासौ मुनिसत्तमः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১২ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ এখানে উপলব্ধ নয়।

Verse 113

मुनय ऊचुः ब्रह्मपारं मुने श्रोतुम् इच्छामः परमं शुभम् जपता कण्डुना देवो येनाराध्यत केशवः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১৩ উল্লেখিত; মূল শ্লোক-পাঠ এখানে দেওয়া হয়নি।

Verse 114

व्यास उवाच पारं परं विष्णुर् अपारपारः परः परेभ्यः परमात्मरूपः स ब्रह्मपारः परपारभूतः परः पराणाम् अपि पारपारः

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১৪; মূল পাঠ না থাকায় অর্থানুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 115

स कारणं कारणसंश्रितो ऽपि तस्यापि हेतुः परहेतुहेतुः कार्यो ऽपि चैष सह कर्मकर्तृ रूपैर् अनेकैर् अवतीह सर्वम्

এখানে ১১৫ শ্লোকাঙ্ক; মূল শ্লোক না দেখলে ব্যাখ্যা করা যায় না।

Verse 116

ब्रह्म प्रभुर् ब्रह्म स सर्वभूतो ब्रह्म प्रजानां पतिर् अच्युतो ऽसौ ब्रह्माव्ययं नित्यम् अजं स विष्णुर् अपक्षयाद्यैर् अखिलैर् असङ्गः

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১৬; মূল পাঠ পাওয়া গেলে যথাযথ অর্থ দেওয়া হবে।

Verse 117

ब्रह्माक्षरम् अजं नित्यं यथासौ पुरुषोत्तमः तथा रागादयो दोषाः प्रयान्तु प्रशमं मम //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১৭ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ এখানে উপলব্ধ নয়।

Verse 118

व्यास उवाच श्रुत्वा तस्य मुनेर् जाप्यं ब्रह्मपारं द्विजोत्तमाः भक्तिं च परमां ज्ञात्वा सुदृढां पुरुषोत्तमः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১৮ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ এখানে প্রদর্শিত নয়।

Verse 119

प्रीत्या स परया देवस् तदासौ भक्तवत्सलः गत्वा तस्य समीपं तु प्रोवाच मधुसूदनः //

এখানে কেবল শ্লোক-সংখ্যা ১১৯ উল্লেখিত; তার মূল পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 120

मेघगम्भीरया वाचा दिशः संनादयन्न् इव आरुह्य गरुडं विप्रा विनताकुलनन्दनम् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২০ নির্দিষ্ট; মূল শ্লোকের বাক্য এখানে দেখা যায় না।

Verse 121

श्रीभगवान् उवाच मुने ब्रूहि परं कार्यं यत् ते मनसि वर्तते वरदो ऽहम् अनुप्राप्तो वरं वरय सुव्रत //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২১ নির্দেশিত; এই শ্লোকের মূল পাঠ এখানে উপলব্ধ নয়।

Verse 122

श्रुत्वैवं वचनं तस्य देवदेवस्य चक्रिणः चक्षुर् उन्मील्य सहसा ददर्श पुरतो हरिम् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২২ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 123

अतसीपुष्पसंकाशं पद्मपत्त्रायतेक्षणम् शङ्खचक्रगदापाणिं मुकुटाङ्गदधारिणम् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২৩ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 124

चतुर्बाहुम् उदाराङ्गं पीतवस्त्रधरं शुभम् श्रीवत्सलक्ष्मसंयुक्तं वनमालाविभूषितम् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২৪ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 125

सर्वलक्षणसंयुक्तं सर्वरत्नविभूषितम् दिव्यचन्दनलिप्ताङ्गं दिव्यमाल्यविभूषितम् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২৫ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 126

ततः स विस्मयाविष्टो रोमाञ्चिततनूरुहः दण्डवत् प्रणिपत्योर्व्यां प्रणामम् अकरोत् तदा //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২৬ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 127

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः इत्य् उक्त्वा मुनिशार्दूलास् तं स्तोतुम् उपचक्रमे //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ‘১২৭’ নির্দেশিত; মূল শ্লোক-পাঠ এখানে উপলব্ধ নয়।

Verse 128

कण्डुर् उवाच नारायण हरे कृष्ण श्रीवत्साङ्क जगत्पते जगद्बीज जगद्धाम जगत्साक्षिन् नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ‘১২৮’ নির্দেশ আছে; মূল শ্লোক এখানে দেওয়া হয়নি।

Verse 129

अव्यक्त जिष्णो प्रभव प्रधानपुरुषोत्तम पुण्डरीकाक्ष गोविन्द लोकनाथ नमो ऽस्तु ते //

এখানে কেবল ‘১২৯’ শ্লোকাঙ্ক দেখা যায়; শ্লোক-পাঠ অনুপলব্ধ।

Verse 130

हिरण्यगर्भ श्रीनाथ पद्मनाथ सनातन भूगर्भ ध्रुव ईशान हृषीकेश नमो ऽस्तु ते //

এখানে ‘১৩০’ শ্লোক-সংখ্যা নির্দিষ্ট; মূল শ্লোক-পাঠ প্রদান করা হয়নি।

Verse 131

अनाद्यन्तामृताजेय जय त्वं जयतां वर अजिताखण्ड श्रीकृष्ण श्रीनिवास नमो ऽस्तु ते //

এখানে ‘১৩১’ শ্লোকাঙ্কের নির্দেশ আছে; মূল পাঠ না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 132

पर्जन्यधर्मकर्ता च दुष्पार दुरधिष्ठित दुःखार्तिनाशन हरे जलशायिन् नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “১৩২” সংখ্যা দেওয়া হয়েছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 133

भूतपाव्यक्त भूतेश भूततत्त्वैर् अनाकुल भूताधिवास भूतात्मन् भूतगर्भ नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “১৩৩” সংখ্যা দেওয়া হয়েছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 134

यज्ञयज्वन् यज्ञधर यज्ञधाताभयप्रद यज्ञगर्भ हिरण्याङ्ग पृश्निगर्भ नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “১৩৪” সংখ্যা দেওয়া হয়েছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 135

क्षेत्रज्ञः क्षेत्रभृत् क्षेत्री क्षेत्रहा क्षेत्रकृद् वशी क्षेत्रात्मन् क्षेत्ररहित क्षेत्रस्रष्ट्रे नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “১৩৫” সংখ্যা দেওয়া হয়েছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 136

गुणालय गुणावास गुणाश्रय गुणावह गुणभोक्तृ गुणाराम गुणत्यागिन् नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “১৩৬” সংখ্যা দেওয়া হয়েছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 137

त्वं विष्णुस् त्वं हरिश् चक्री त्वं जिष्णुस् त्वं जनार्दनः त्वं भूतस् त्वं वषट्कारस् त्वं भव्यस् त्वं भवत्प्रभुः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 138

त्वं भूतकृत् त्वम् अव्यक्तस् त्वं भवो भूतभृद् भवान् त्वं भूतभावनो देवस् त्वाम् आहुर् अजम् ईश्वरम् //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 139

त्वम् अनन्तः कृतज्ञस् त्वं प्रकृतिस् त्वं वृषाकपिः त्वं रुद्रस् त्वं दुराधर्षस् त्वम् अमोघस् त्वम् ईश्वरः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 140

त्वं विश्वकर्मा जिष्णुस् त्वं त्वं शंभुस् त्वं वृषाकृतिः त्वं शंकरस् त्वम् उशना त्वं सत्यं त्वं तपो जनः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 141

त्वं विश्वजेता त्वं शर्म त्वं शरण्यस् त्वम् अक्षरम् त्वं शंभुस् त्वं स्वयंभूश् च त्वं ज्येष्ठस् त्वं परायणः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 142

त्वम् आदित्यस् त्वम् ॐकारस् त्वं प्राणस् त्वं तमिस्रहा त्वं पर्जन्यस् त्वं प्रथितस् त्वं वेधास् त्वं सुरेश्वरः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “142” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 143

त्वम् ऋग् यजुः साम चैव त्वम् आत्मा संमतो भवान् त्वम् अग्निस् त्वं च पवनस् त्वम् आपो वसुधा भवान् //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “143” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 144

त्वं स्रष्टा त्वं तथा भोक्ता होता त्वं च हविः क्रतुः त्वं प्रभुस् त्वं विभुः श्रेष्ठस् त्वं लोकपतिर् अच्युतः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “144” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 145

त्वं सर्वदर्शनः श्रीमांस् त्वं सर्वदमनो ऽरिहा त्वम् अहस् त्वं तथा रात्रिस् त्वाम् आहुर् वत्सरं बुधाः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “145” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 146

त्वं कालस् त्वं कला काष्ठा त्वं मुहूर्तः क्षणा लवाः त्वं बालस् त्वं तथा वृद्धस् त्वं पुमान् स्त्री नपुंसकः //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; শুধু “146” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করব।

Verse 147

त्वं विश्वयोनिस् त्वं चक्षुस् त्वं स्थाणुस् त्वं शुचिश्रवाः त्वं शाश्वतस् त्वम् अजितस् त्वम् उपेन्द्रस् त्वम् उत्तमः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৪৭ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত থাকায় অনুবাদ করা যাচ্ছে না।

Verse 148

त्वं सर्वविश्वसुखदस् त्वं वेदाङ्गं त्वम् अव्ययः त्वं वेदवेदस् त्वं धाता विधाता त्वं समाहितः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৪৮ নির্দেশিত; মূল শ্লোকপাঠ না থাকায় ব্যাখ্যা-অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 149

त्वं जलनिधिर् आमूलं त्वं धाता त्वं पुनर् वसुः त्वं वैद्यस् त्वं धृतात्मा च त्वम् अतीन्द्रियगोचरः //

এখানে ১৪৯ শ্লোক-সংখ্যা আছে; পাঠের অভাবে অর্থনির্ণয় ও অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 150

त्वम् अग्रणीर् ग्रामणीस् त्वं त्वं सुपर्णस् त्वम् आदिमान् त्वं संग्रहस् त्वं सुमहत् त्वं धृतात्मा त्वम् अच्युतः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫০; মূল পাঠ অনুপস্থিত থাকায় অনুবাদ করা যাচ্ছে না।

Verse 151

त्वं यमस् त्वं च नियमस् त्वं प्रांशुस् त्वं चतुर्भुजः त्वम् एवान्नान्तरात्मा त्वं परमात्मा त्वम् उच्यते //

এখানে ১৫১ শ্লোক-সংখ্যা; মূল শ্লোকপাঠ দেওয়া হয়নি, তাই অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 152

त्वं गुरुस् त्वं गुरुतमस् त्वं वामस् त्वं प्रदक्षिणः त्वं पिप्पलस् त्वम् अगमस् त्वं व्यक्तस् त्वं प्रजापतिः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫২ নির্দেশিত; এই পদের মূল পাঠ উপলব্ধ নয়।

Verse 153

हिरण्यनाभस् त्वं देवस् त्वं शशी त्वं प्रजापतिः अनिर्देश्यवपुस् त्वं वै त्वं यमस् त्वं सुरारिहा //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫৩ নির্দেশিত; এই শ্লোকের মূল পাঠ পাওয়া যায় না।

Verse 154

त्वं च संकर्षणो देवस् त्वं कर्ता त्वं सनातनः त्वं वासुदेवो ऽमेयात्मा त्वम् एव गुणवर्जितः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫৪ নির্দিষ্ট; এই শ্লোকের মূল বচন দৃশ্যমান নয়।

Verse 155

त्वं ज्येष्ठस् त्वं वरिष्ठस् त्वं त्वं सहिष्णुश् च माधवः सहस्रशीर्षा त्वं देवस् त्वम् अव्यक्तः सहस्रदृक् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫৫; এই শ্লোকের মূল পাঠ প্রাপ্ত হয় না।

Verse 156

सहस्रपादस् त्वं देवस् त्वं विराट् त्वं सुरप्रभुः त्वम् एव तिष्ठसे भूयो देवदेव दशाङ्गुलः //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫৬ নির্দেশিত; এই শ্লোকের মূল পাঠ অনুপলব্ধ।

Verse 157

यद् भूतं तत् त्वम् एवोक्तः पुरुषः शक्र उत्तमः यद् भाव्यं तत् त्वम् ईशानस् त्वम् ऋतस् त्वं तथामृतः //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ এখানে দেওয়া নেই; তাই যথাযথ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 158

त्वत्तो रोहत्य् अयं लोको महीयांस् त्वम् अनुत्तमः त्वं ज्यायान् पुरुषस् त्वं च त्वं देव दशधा स्थितः //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ অনুপস্থিত; তাই নির্ভুল অনুবাদ করা যাচ্ছে না। অনুগ্রহ করে শ্লোক দিন।

Verse 159

विश्वभूतश् चतुर्भागो नवभागो ऽमृतो दिवि नवभागो ऽन्तरिक्षस्थः पौरुषेयः सनातनः //

এখানে শ্লোকের সংস্কৃত মূল দেওয়া হয়নি; তাই অর্থানুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে মূল শ্লোক দিন।

Verse 160

भागद्वयं च भूसंस्थं चतुर्भागो ऽप्य् अभूद् इह त्वत्तो यज्ञाः संभवन्ति जगतो वृष्टिकारणम् //

শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ না থাকায় নিশ্চিত অনুবাদ করা যায় না; অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।

Verse 161

त्वत्तो विराट् समुत्पन्नो जगतो हृदि यः पुमान् सो ऽतिरिच्यत भूतेभ्यस् तेजसा यशसा श्रिया //

এই পদ্যের সংস্কৃত মূল না থাকলে ভাবার্থ নির্ধারণ করা যায় না; অনুগ্রহ করে শ্লোক-পাঠ দিন।

Verse 162

त्वत्तः सुराणाम् आहारः पृषदाज्यम् अजायत ग्राम्यारण्याश् चौषधयस् त्वत्तः पशुमृगादयः //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “১৬২” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 163

ध्येयध्यानपरस् त्वं च कृतवान् असि चौषधीः त्वं देवदेव सप्तास्य कालाख्यो दीप्तविग्रहः //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “১৬৩” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 164

जङ्गमाजङ्गमं सर्वं जगद् एतच् चराचरम् त्वत्तः सर्वम् इदं जातं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “১৬৪” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 165

अनिरुद्धस् त्वं माधवस् त्वं प्रद्युम्नः सुरारिहा देव सर्वसुरश्रेष्ठ सर्वलोकपरायण //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “১৬৫” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 166

त्राहि माम् अरविन्दाक्ष नारायण नमो ऽस्तु ते नमस् ते भगवन् विष्णो नमस् ते पुरुषोत्तम //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; শুধু “১৬৬” সংখ্যা আছে। অনুগ্রহ করে শ্লোকের পাঠ দিন।

Verse 167

नमस् ते सर्वलोकेश नमस् ते कमलालय गुणालय नमस् ते ऽस्तु नमस् ते ऽस्तु गुणाकर //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন শাস্ত্রীয় ভঙ্গিতে অনুবাদ করব।

Verse 168

वासुदेव नमस् ते ऽस्तु नमस् ते ऽस्तु सुरोत्तम जनार्दन नमस् ते ऽस्तु नमस् ते ऽस्तु सनातन //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন শাস্ত্রীয় ভঙ্গিতে অনুবাদ করব।

Verse 169

नमस् ते योगिनां गम्य योगावास नमो ऽस्तु ते गोपते श्रीपते विष्णो नमस् ते ऽस्तु मरुत्पते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন শাস্ত্রীয় ভঙ্গিতে অনুবাদ করব।

Verse 170

जगत्पते जगत्सूते नमस् ते ज्ञानिनां पते दिवस्पते नमस् ते ऽस्तु नमस् ते ऽस्तु महीपते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন শাস্ত্রীয় ভঙ্গিতে অনুবাদ করব।

Verse 171

नमस् ते मधुहन्त्रे च नमस् ते पुष्करेक्षण कैटभघ्न नमस् ते ऽस्तु सुब्रह्मण्य नमो ऽस्तु ते //

এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন শাস্ত্রীয় ভঙ্গিতে অনুবাদ করব।

Verse 172

नमो ऽस्तु ते महामीन श्रुतिपृष्ठधराच्युत समुद्रसलिलक्षोभ पद्मजाह्लादकारिणे //

এখানে ‘১৭২’ সংখ্যক শ্লোক নির্দেশিত; গ্রন্থে তার মূল পাঠ যথাস্থানে দ্রষ্টব্য।

Verse 173

अश्वशीर्ष महाघोण महापुरुषविग्रह मधुकैटभहन्त्रे च नमस् ते तुरगानन //

এখানে ‘১৭৩’ সংখ্যক শ্লোক নির্দেশিত; গ্রন্থে তার মূল পাঠ যথাস্থানে দ্রষ্টব্য।

Verse 174

महाकमठभोगाय पृथिव्युद्धरणाय च विधृताद्रिस्वरूपाय महाकूर्माय ते नमः //

এখানে ‘১৭৪’ সংখ্যক শ্লোক নির্দেশিত; গ্রন্থে তার মূল পাঠ যথাস্থানে দ্রষ্টব্য।

Verse 175

नमो महावराहाय पृथिव्युद्धारकारिणे नमश् चादिवराहाय विश्वरूपाय वेधसे //

এখানে ‘১৭৫’ সংখ্যক শ্লোক নির্দেশিত; গ্রন্থে তার মূল পাঠ যথাস্থানে দ্রষ্টব্য।

Verse 176

नमो ऽनन्ताय सूक्ष्माय मुख्याय च वराय च परमाणुस्वरूपाय योगिगम्याय ते नमः //

এখানে ‘১৭৬’ সংখ্যক শ্লোক নির্দেশিত; গ্রন্থে তার মূল পাঠ যথাস্থানে দ্রষ্টব্য।

Verse 177

तस्मै नमः कारणकारणाय योगीन्द्रवृत्तनिलयाय सुदुर्विदाय क्षीरार्णवाश्रितमहाहिसुतल्पगाय तुभ्यं नमः कनकरत्नसुकुण्डलाय

এখানে ১৭৭ নম্বর শ্লোকের উল্লেখ আছে, কিন্তু মূল সংস্কৃত পাঠ নেই; তাই অনুবাদ করা সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 178

व्यास उवाच इत्थं स्तुतस् तदा तेन प्रीतः प्रोवाच माधवः क्षिप्रं ब्रूहि मुनिश्रेष्ठ मत्तो यद् अभिवाञ्छसि //

এখানে ১৭৮ নম্বর শ্লোকের সংখ্যা আছে, কিন্তু মূল শ্লোক নেই; তাই অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।

Verse 179

कण्डुर् उवाच संसारे ऽस्मिञ् जगन्नाथ दुस्तरे लोमहर्षणे अनित्ये दुःखबहुले कदलीदलसंनिभे //

এখানে শুধু ১৭৯ সংখ্যা আছে; শ্লোকের পাঠ নেই, তাই যথার্থ অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি লিখুন।

Verse 180

निराश्रये निरालम्बे जलबुद्बुदचञ्चले सर्वोपद्रवसंयुक्ते दुस्तरे चातिभैरवे //

এখানে ১৮০ শ্লোকসংখ্যা আছে; কিন্তু মূল শ্লোক পাওয়া যাচ্ছে না, তাই অনুবাদ করা যাচ্ছে না। অনুগ্রহ করে মূল পাঠ দিন।

Verse 181

भ्रमामि सुचिरं कालं मायया मोहितस् तव न चान्तम् अभिगच्छामि विषयासक्तमानसः //

এখানে ১৮১ সংখ্যা মাত্র; মূল শ্লোকপাঠ না থাকলে অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন।

Verse 182

त्वाम् अहं चाद्य देवेश संसारभयपीडितः गतो ऽस्मि शरणं कृष्ण माम् उद्धर भवार्णवात् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৮২ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ এখানে উপলব্ধ নয়।

Verse 183

गन्तुम् इच्छामि परमं पदं यत् ते सनातनम् प्रसादात् तव देवेश पुनरावृत्तिदुर्लभम् //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৮৩ উল্লেখিত; মূল শ্লোকপাঠ এখানে দেওয়া হয়নি।

Verse 184

श्रीभगवान् उवाच भक्तो ऽसि मे मुनिश्रेष्ठ माम् आराधय नित्यशः मत्प्रसादाद् ध्रुवं मोक्षं प्राप्यसि त्वं समीहितम् //

এখানে ১৮৪ শ্লোকাঙ্ক; তার মূল বাক্য এখানে পাওয়া যাচ্ছে না।

Verse 185

मद्भक्ताः क्षत्रिया वैश्याः स्त्रियः शूद्रान्त्यजातिजाः प्राप्नुवन्ति परां सिद्धिं किं पुनस् त्वं द्विजोत्तम //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৮৫ নির্দিষ্ট; মূল পাঠ না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়।

Verse 186

श्वपाको ऽपि च मद्भक्तः सम्यक् श्रद्धासमन्वितः प्राप्नोत्य् अभिमतां सिद्धिम् अन्येषां तत्र का कथा //

এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৮৬; মূল শ্লোকপাঠ ছাড়া ভাবানুবাদ সম্পন্ন হয় না।

Verse 187

व्यास उवाच एवम् उक्त्वा तु तं विप्राः स देवो भक्तवत्सलः दुर्विज्ञेयगतिर् विष्णुस् तत्रैवान्तरधीयत //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১৮৭ নির্দেশিত; মূল পাঠ দেওয়া নেই। শ্লোক দিলে অনুবাদ করা হবে।

Verse 188

गते तस्मिन् मुनिश्रेष्ठाः कण्डुः संहृष्टमानसः सर्वान् कामान् परित्यज्य स्वस्थचित्तो भवत् पुनः //

এখানে শ্লোকসংখ্যা ১৮৮ উল্লেখ আছে; মূল শ্লোক অনুপস্থিত। পাঠ দিলে অনুবাদ করা যাবে।

Verse 189

सर्वेन्द्रियाणि संयम्य निर्ममो निरहंकृतिः एकाग्रमानसः सम्यग् ध्यात्वा तं पुरुषोत्तमम् //

এখানে ১৮৯ শ্লোকসংখ্যা আছে, কিন্তু মূল পাঠ নেই। শ্লোক পাঠালে অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 190

निर्लेपं निर्गुणं शान्तं सत्तामात्रव्यवस्थितम् अवाप परमं मोक्षं सुराणाम् अपि दुर्लभम् //

এখানে ১৯০ শ্লোক নির্দেশিত; মূল শ্লোক না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।

Verse 191

यः पठेच् छृणुयाद् वापि कथां कण्डोर् महात्मनः विमुक्तः सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोकं स गच्छति //

এখানে ১৯১ শ্লোকসংখ্যা; মূল পাঠ নেই। শ্লোক দিলে যথাসাধ্য পবিত্র অনুবাদ দেওয়া হবে।

Verse 192

एवं मया मुनिश्रेष्ठाः कर्मभूमिर् उदाहृता मोक्षक्षेत्रं च परमं देवं च पुरुषोत्तमम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করা হবে।

Verse 193

ये पश्यन्ति विभुं स्तुवन्ति वरदं ध्यायन्ति मुक्तिप्रदं भक्त्या श्रीपुरुषोत्तमाख्यम् अजरं संसारदुःखापहम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করা হবে।

Verse 194

ते भुक्त्वा मनुजेन्द्रभोगम् अमलाः स्वर्गे च दिव्यं सुखं पश्चाद् यान्ति समस्तदोषरहिताः स्थानं हरेर् अव्ययम् //

এই শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি দিন, তখন যথাযথ অনুবাদ করা হবে।

Frequently Asked Questions

The chapter foregrounds the fragility of ascetic attainment when sense-control is compromised, presenting kāma as a destabilizing force even for accomplished sages. Its ethical pivot is self-accountability: Kaṇḍu ultimately attributes the lapse to his own unmastered faculties rather than demonizing the apsaras, and the narrative culminates in restoration through disciplined bhakti and nirguṇa contemplation of Puruṣottama.

It integrates multiple foundational purāṇic registers—ascetic trial motifs, a compact genealogical bridge (Māriṣā as mother of Dakṣa), and a strong sacred-topography frame centered on Puruṣottama-kṣetra. By linking moral narrative, lineage memory, and place-based soteriology under Viṣṇu’s supremacy, the chapter exemplifies the Brahma Purana’s early encyclopedic purāṇa style.

The chapter highlights pilgrimage and worship at Puruṣottama-kṣetra (Viṣṇu’s āyatana on the southern seashore) as mokṣa-oriented practice. It also foregrounds a specific devotional discipline—‘brahmapāra’ japa—performed with one-pointed concentration, alongside the broader frame of darśana, stuti, and continuous ārādhana of Hari as the operative soteriological method.