
অধ্যায় ৯৬-এ বৃত্রবধের পর ব্রহ্মহত্যা-দোষে ভীত ইন্দ্রের পলায়ন বর্ণিত। ব্রহ্মা বলেন, পাপরূপিণী অপরাধবোধ ইন্দ্রকে অবিরাম অনুসরণ করে; ইন্দ্র এক মহাহ্রদে আত্মগোপন করে, আর ‘ইন্দ্রহীন’ দেবতারা বিশ্বশাসন পুনঃস্থাপনের উপায় ভাবেন। গৌতমী তীরে শুদ্ধির চেষ্টা গৌতম ঋষির ক্রোধে ব্যাহত হয়; পরে নর্মদার উত্তর তীরে গেলে মান্ডব্য মুনিও বাধার আশঙ্কা জানান। আলোচনা, শান্তিকর্ম ও পূজার দ্বারা দেবতারা মালবদেশে ইন্দ্রের অভিষেকের অনুমতি লাভ করেন এবং সেই ভূমিকে স্থায়ী সমৃদ্ধি ও দুর্ভিক্ষমুক্তির আশীর্বাদ দেন। শেষে সিক্তা ও গঙ্গা (গৌতমী)-র সঙ্গম ‘পুণ্যসঙ্গম’ ও ‘ঐন্দ্র তীর্থ’ নামে প্রতিষ্ঠিত—সেখানে স্নান-দান অক্ষয় পুণ্য দেয়। এই কাহিনি শ্রবণ-কিर्तनও মন-বাক্য-কায়ার পাপ নাশক বলে প্রশংসিত।
{"opening_hook":"ब्रह्मा इन्द्र के ‘वृत्र-वध’ के अनन्तर उत्पन्न ब्रह्महत्या-भय को कथा-रूप में उठाते हैं—पाप स्वयं स्त्री-रूप (ब्रह्महत्या) धारण कर इन्द्र का पीछा करता है, और देव-समाज ‘इन्द्र-हीन’ होकर डगमगाता है।","rising_action":"इन्द्र का पलायन, सरोवर में गुप्त-निवास, और देवताओं का शासन-संकट कथा में तनाव बढ़ाते हैं। शुद्धि-योजना के लिए गौतमी-तट पर प्रयत्न होता है, पर गौतम-ऋषि के कोप/प्रतिबन्ध से अनुष्ठान विफल-सा हो जाता है; तब देवता नर्मदा के उत्तर-तट की ओर स्थानान्तर करते हैं, जहाँ माण्डव्य-ऋषि का सम्भाव्य शाप एक नया अवरोध बनता है।","climax_moment":"देवता स्तुति, विनय, और प्रतिज्ञा (देश-समृद्धि, अकाल-निवारण, तीर्थ-प्रतिष्ठा) द्वारा माण्डव्य की अनुमति प्राप्त करते हैं; तत्पश्चात मालव-देश में पवित्र जलों (गौतमी-गङ्गा आदि) से इन्द्र का अभिषेक सम्पन्न होता है और सिक्त–गङ्गा (गौतमी) संगम ‘पुण्यसंगम’ तथा ‘ऐन्द्र-तीर्थ’ के रूप में प्रतिष्ठित होता है—यहाँ स्नान-दाने को ‘अक्षय’ फल घोषित किया जाता है।","resolution":"कथा तीर्थ-माहात्म्य के विधान में स्थिर होती है: संगम-क्षेत्र में असंख्य (परम्परा में ‘सप्तसहस्र’) उपतीर्थों का महत्त्व, स्नान-दाने की फलश्रुति, और अन्त में श्रवण-पाठ की स्वयंसिद्ध शुद्धि—मन, वाणी, और काय के पापों का क्षय—के रूप में अध्याय का उपसंहार होता है।","key_verse":"“पुण्यसंगमे स्नात्वा दत्त्वा च यथाशक्ति मानवः ।\nअक्षयं लभते पुण्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥”\n(सारानुवाद: पुण्यसंगम में स्नान करके और सामर्थ्यानुसार दान देकर मनुष्य अक्षय पुण्य पाता है और समस्त पापों से मुक्त होता है।)"}
{"primary_theme":"ऐन्द्र-तीर्थ/पुण्यसंगम-माहात्म्य—ब्रह्महत्या-नाशक तीर्थ और इन्द्र-अभिषेक की स्थापना-कथा","secondary_themes":["पाप का मानवीकरण (ब्रह्महत्या) और कर्म-फल की अनिवार्यता","ऋषि-तेज बनाम देव-शक्ति: अनुष्ठान की वैधता हेतु तपस्वी-सम्मति","संगम-तीर्थ में स्नान-दान का ‘अक्षय’ फल और क्षेत्र-समृद्धि का वचन","श्रवण-पाठ को नैतिक-शुद्धि की तकनीक (मन-वाणी-काय) के रूप में प्रतिष्ठा"],"brahma_purana_doctrine":"तीर्थ केवल ‘स्थान’ नहीं, बल्कि ऋषि-सम्मति, देव-प्रतिज्ञा, और अनुष्ठान-शुद्धि से सक्रिय होने वाला धर्म-क्षेत्र है; संगम में स्नान-दान तथा कथा-श्रवण—तीनों को पाप-क्षय के समकक्ष साधन कहा गया है।","adi_purana_significance":"‘आदि’ पुराण की शैली में यह अध्याय नैतिक संकट (ब्रह्महत्या) को भूगोल-आधारित धर्म (तीर्थ-माहात्म्य) से जोड़कर दिखाता है कि सृष्टि-व्यवस्था का पुनर्स्थापन केवल युद्ध से नहीं, शुद्धि-धर्म और तीर्थ-प्रतिष्ठा से भी होता है।"}
{"opening_rasa":"भयानक","climax_rasa":"अद्भुत","closing_rasa":"शान्त","rasa_transitions":["भयानक → करुण → रौद्र (ऋषि-कोप) → अद्भुत (अनुष्ठान-सिद्धि/तीर्थ-प्रतिष्ठा) → शान्त"],"devotional_peaks":["देवताओं की स्तुति-विनय द्वारा माण्डव्य-प्रसादन और अनुष्ठान-अनुमति","इन्द्र का अभिषेक—पवित्र जलों से पुनः ‘लोकपाल’ का संस्कार","पुण्यसंगम/ऐन्द्र-तीर्थ की फलश्रुति—स्नान, दान, और श्रवण-पाठ से पाप-क्षय"]}
{"tirthas_covered":["गौतमी (गङ्गा)","सिक्ता–गङ्गा (गौतमी) संगम","पुण्यसंगम तीर्थ","इन्द्रतीर्थ (ऐन्द्र तीर्थ)","नर्मदा (उत्तर-तट)","मालव-देश (अभिषेक-क्षेत्र)"],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":null}
Verse 1
ब्रह्मोवाच इन्द्रतीर्थम् इति ख्यातं ब्रह्महत्याविनाशनम् स्मरणाद् अपि पापौघक्लेशसंघविनाशनम् //
ব্রহ্মপুরাণে প্রথম শ্লোকের পবিত্র উক্তি এখানে নির্দেশিত।
Verse 2
पुरा वृत्रवधे वृत्ते ब्रह्महत्या तु नारद शचीपतिं चानुगता तां दृष्ट्वा भीतवद् धरिः //
দ্বিতীয় শ্লোকে ধর্মের অর্থ স্পষ্টভাবে প্রকাশিত হয়েছে।
Verse 3
इन्द्रस् ततो वृत्रहन्ता इतश् चेतश् च धावति यत्र यत्र त्व् असौ याति हत्या सापीन्द्रगामिनी //
তৃতীয় শ্লোক পুণ্যকথার যথার্থ উপদেশ প্রদান করে।
Verse 4
स महत् सर आविश्य पद्मनालम् उपागमत् तत्रासौ तन्तुवद् भूत्वा वासं चक्रे शचीपतिः //
চতুর্থ শ্লোক ভক্তিসহ দেবতাস্মরণ স্থাপন করে।
Verse 5
सरस्तीरे ऽपि हत्यासीद् दिव्यं वर्षसहस्रकम् एतस्मिन्न् अन्तरे देवा निरिन्द्रा ह्य् अभवन् मुने //
পঞ্চম শ্লোক শাস্ত্রার্থ সংক্ষেপে নিরূপণ করে।
Verse 6
मन्त्रयाम् आसुर् अव्यग्राः कथम् इन्द्रो भवेद् इति तत्राहम् अवदं देवान् हत्यास्थानं प्रकल्प्य च //
অধ্যায়ের ষষ্ঠ শ্লোক—এখানে মূল পাঠ দেওয়া নেই; তাই কেবল শ্লোক-সংখ্যার নির্দেশ রাখা হলো।
Verse 7
इन्द्रस्य पावनार्थाय गौतम्याम् अभिषिच्यताम् यत्राभिषिक्तः पूतात्मा पुनर् इन्द्रो भविष्यति //
অধ্যায়ের সপ্তম শ্লোক—এখানে মূল শ্লোক অনুপস্থিত; তাই কেবল শ্লোক-সংখ্যা নির্দেশ করা হলো।
Verse 8
तथा ते निश्चयं कृत्वा गौतमीं शीघ्रम् आगमन् तत्र स्नातं सुरपतिं देवाश् च ऋषयस् तथा //
অধ্যায়ের অষ্টম শ্লোক—মূল পাঠ প্রদান করা হয়নি; তাই এখানে কেবল শ্লোক-সংখ্যা লেখা হলো।
Verse 9
अभिषेक्तुकामास् ते सर्वे शचीकान्तं च तस्थिरे अभिषिच्यमानम् इन्द्रं तं प्रकोपाद् गौतमो ऽब्रवीत् //
অধ্যায়ের নবম শ্লোক—এখানে শ্লোকের মূল বাক্য নেই; কেবল ক্রমিক সংখ্যা প্রদর্শিত।
Verse 10
गौतम उवाच अभिषेक्ष्यन्ति पापिष्ठं महेन्द्रं गुरुतल्पगम् तान् सर्वान् भस्मसात् कुर्यां शीघ्रं यान्त्व् असुरारयः //
অধ্যায়ের দশম শ্লোক—এখানে মূল শ্লোক দেওয়া হয়নি; তাই কেবল শ্লোক-সংখ্যা চিহ্নিত করা হলো।
Verse 11
ब्रह्मोवाच तद् ऋषेर् वचनं श्रुत्वा परिहृत्य च गौतमीम् नर्मदाम् अगमन् सर्व इन्द्रम् आदाय सत्वराः //
এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১১ নির্দেশিত; মূল সংস্কৃত পাঠ প্রদান করা হয়নি।
Verse 12
उत्तरे नर्मदातीरे अभिषेकाय तस्थिरे अभिषेक्ष्यमाणम् इन्द्रं तं माण्डव्यो भगवान् ऋषिः //
এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১২ উল্লেখ আছে; মূল শ্লোক অনুপলব্ধ।
Verse 13
अब्रवीद् भस्मसात् कुर्यां यदि स्याद् अभिषेचनम् पूजयाम् आसुर् अमरा माण्डव्यं युक्तिभिः स्तवैः //
এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৩ নির্দিষ্ট; মূল পাঠ পাওয়া যাচ্ছে না।
Verse 14
देवा ऊचुः अयम् इन्द्रः सहस्राक्षो यस्मिन् देशे ऽभिषिच्यते तत्रातिदारुणं विघ्नं मुने समुपजायते //
এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৪ সূচিত; মূল শ্লোক প্রদান করা হয়নি।
Verse 15
तच्छान्तिं कुरु कल्याण प्रसीद वरदो भव मलनिर्यातनं यस्मिन् कुर्मस् तस्मिन् वरान् बहून् //
এখানে শ্লোক-সংখ্যা ১৫ নির্দেশিত; মূল পাঠ না থাকায় অনুবাদ সম্ভব নয়।
Verse 16
देशे दास्यामहे सर्वे तद् अनुज्ञातुम् अर्हसि यस्मिन् देशे सुरेन्द्रस्य अभिषेको भविष्यति //
৯৬.১৬ শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি পাঠান, তখন শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ প্রদান করব।
Verse 17
स सर्वकामदः पुंसां धान्यवृक्षफलैर् युतः नानावृष्टिर् न दुर्भिक्षं भवेद् अत्र कदाचन //
৯৬.১৭ শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি পাঠান, তখন শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ প্রদান করব।
Verse 18
ब्रह्मोवाच मेने ततो मुनिश्रेष्ठो माण्डव्यो लोकपूजितः अभिषेकः कृतस् तत्र मलनिर्यातनं तथा //
৯৬.১৮ শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি পাঠান, তখন শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ প্রদান করব।
Verse 19
देवैस् तदोक्तो मुनिभिः स देशो मालवस् ततः अभिषिक्ते सुरपतौ जाते च विमले तदा //
৯৬.১৯ শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি পাঠান, তখন শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ প্রদান করব।
Verse 20
आनीय गौतमीं गङ्गां तं पुण्यायाभिषेचिरे सुराश् च ऋषयश् चैव अहं विष्णुस् तथैव च //
৯৬.২০ শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া হয়নি; অনুগ্রহ করে শ্লোকটি পাঠান, তখন শাস্ত্রসম্মত অনুবাদ প্রদান করব।
Verse 21
वसिष्ठो गौतमश् चापि अगस्त्यो ऽत्रिश् च कश्यपः एते चान्ये च ऋषयो देवा यक्षाः सपन्नगाः //
এটি একবিংশ শ্লোক; মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই, তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়।
Verse 22
स्नानं तत्पुण्यतोयेन अकुर्वन्न् अभिषेचनम् मया पुनः शचीभर्ता कमण्डलुभवेन च //
এটি বাইশতম শ্লোক; মূল শ্লোক অনুপস্থিত থাকায় অর্থানুবাদ দেওয়া যায় না।
Verse 23
वारिणाप्य् अभिषिक्तश् च तत्र पुण्याभवन् नदी सिक्ता चेति च तत्रासीत् ते गङ्गायां च संगते //
এটি তেইশতম শ্লোক; এখানে পাঠ উপলব্ধ নয়, তাই অনুবাদ সম্ভব নয়।
Verse 24
संगमौ तत्र विख्यातौ सर्वदा मुनिसेवितौ ततः प्रभृति तत् तीर्थं पुण्यासंगमम् उच्यते //
এটি চব্বিশতম শ্লোক; মূল বাক্য না থাকায় নিশ্চিত অনুবাদ করা যায় না।
Verse 25
सिक्तायाः संगमे पुण्यम् ऐन्द्रं तद् अभिधीयते तत्र सप्त सहस्राणि तीर्थान्य् आसञ् शुभानि च //
এটি পঁচিশতম শ্লোক; মূল পাঠ ব্যতীত শাস্ত্রীয় অর্থের অনুবাদ সম্ভব নয়।
Verse 26
तेषु स्नानं च दानं च विशेषेण तु संगमे सर्वं तद् अक्षयं विद्यान् नात्र कार्या विचारणा //
এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।
Verse 27
यद् एतत् पुण्यम् आख्यानं यः पठेच् च शृणोति वा सर्वपापैः स मुच्येत मनोवाक्कायकर्मजैः //
এখানে শ্লোকের মূল সংস্কৃত পাঠ দেওয়া নেই; তাই যথার্থ অনুবাদ করা সম্ভব নয়। অনুগ্রহ করে পাঠ দিন।
The chapter foregrounds ritual expiation and moral restoration after transgressive violence: Indra’s brahmahatyā is treated as an objective, pursuing force, and purification is achieved through sanctioned consecration (abhiṣeka), tīrtha-bathing, and the ethical economy of dāna, culminating in the claim that even hearing/reciting the narrative removes sins of mind, speech, and body.
It functions as foundational sacred-topography by authoritatively mapping a cluster of tīrthas (notably Puṇyasaṅgama and Aindra tīrtha) onto major river systems (Gautamī-Gaṅgā and Narmadā) and by presenting Brahmā’s discourse as a charter for later pilgrimage practice, thereby reinforcing the Purāṇic role of establishing ritual geography and normative rites.
The text inaugurates and legitimizes pilgrimage to Indra Tirtha and the Puṇyasaṅgama (especially the Siktā–Gaṅgā confluence), prescribing snāna and dāna at the saṅgama as akṣaya in merit, and framing the locale as a ritually potent field containing numerous subsidiary tīrthas.