तत्राशीतिसहस्राणि शिवलिङ्गानि नारद देवागमः पर्वतो ऽसौ प्रिय इत्य् अपि कथ्यते ततः प्रभृति तत् तीर्थं देवप्रियम् अतो विदुः //
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