विराटसभायां पाण्डवानां प्रवेशः — Arjuna’s Encomium of Yudhiṣṭhira in Virāṭa’s Court
अजुन उवाच विहाय कीर्ति विपुलं यशश्नव युद्धात् परावृत्य पलायसे किम् । न तेड्य तूर्याणि समाहतानि तथैव राज्यादवरोपितस्य,अर्जुन बोले--धृतराष्ट्रके पुत्र! तू युद्धसे पीठ दिखाकर क्यों भागा जा रहा है? अरे! ऐसा करके तू अपनी कीर्ति और विशाल यशसे हाथ धो बैठा है। आज तेरे विजयके बाजे पहले-जैसे नहीं बज रहे हैं। तूने जिन्हें राज्यसे उतार दिया है, उन्हीं महाराज युधिष्ठिरका आज्ञाकारी मैं तीसरा पाण्डव युद्धके लिये खड़ा हूँ। अतः तू मेरा सामना करनेके लिये लौटकर अपना मुँह तो दिखा। राजाका आचार-व्यवहार कैसा होना चाहिये, इसकी याद तो कर ले
arjuna uvāca vihāya kīrtiṁ vipulaṁ yaśas ca nava yuddhāt parāvṛtya palāyase kim | na te ’dya tūryāṇi samāhatāni tathaiva rājād avaropitasya ||
অৰ্জুনে ক’লে—মহৎ কীৰ্তি আৰু বিপুল যশ ত্যাগ কৰি, যুদ্ধক পিঠ দি তুমি কিয় পলাইছা? আজি তোমাৰ বিজয়-তূৰ্য আগৰ দৰে নুবাজে। যাক তুমি ৰাজ্যচ্যুত কৰিছিলা, সেই মহাৰাজ যুধিষ্ঠিৰৰ আজ্ঞাত মই তৃতীয় পাণ্ডৱ যুদ্ধক্ষেত্ৰত থিয় হৈ আছোঁ। সেয়ে ঘূৰি আহি মোৰ সন্মুখীন হোৱা; ৰজাৰ উপযুক্ত আচৰণ স্মৰণ কৰা।
अजुन उवाच