Lokapāla-samāgamaḥ—Arjuna Receives Astras from the World-Guardians
Book 3, Chapter 42
नातप्ततपसा शक््य एष दिव्यो महारथ: । द्रष्ट वाप्यथवा स्प्रष्टमारोढुं कुत एव च,जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे इस महान् दिव्य रथका दर्शन या स्पर्श भी नहीं कर सकते, फिर इसपर आरूढ़ होनेकी तो बात ही क्या है?
Arjuna uvāca — nātaptatapasā śakya eṣa divyo mahārathaḥ | draṣṭum apy athavā spraṣṭum āroḍhuṁ kuta eva ca ||
যিয়ে তপস্যা কৰা নাই, সি এই দিব্য মহাৰথখন দেখা বা স্পৰ্শ কৰাও নোৱাৰে; তেন্তে তাত আৰোহণ কৰা কথা ত দূৰৰেই।
अजुन उवाच