कुन्ती द्वारा ब्राह्मण-सेवा
Kuntī’s Regulated Hospitality to a Brāhmaṇa Guest
पतन्त्या स तया वेगाद् राक्षसो5शनिवेगया । ह्वतोत्तमाज़ी ददृशे वातरुग्ण इव द्रुम:,विद्युतके समान वेगवाली उस महाशक्तिका वेगपूर्वक आघात होते ही राक्षस प्रहस्तका मस्तक धड़से अलग हो गया और वह आँधीके द्वारा उखाड़े हुए वृक्षकी भाँति धराशायी दिखायी देने लगा
বিজুলীৰ দৰে বেগে পতিত সেই মহাশক্তিৰ আঘাতে ৰাক্ষস প্ৰহস্তৰ মূৰ ধড়ৰ পৰা বিচ্ছিন্ন হ’ল। ধুমুহাই উপুৰি পেলোৱা গছৰ দৰে সি মাটিত ঢলি পৰিল।
मार्कण्डेय उवाच