Indrajit’s Binding, Restoration by Viśalyā, and Counsel Restraining Rāvaṇa (Āraṇyaka Parva 273)
हि आय ० () हि २ 7 (जयद्रथविमोक्षणपर्व) द्विसप्तत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठटिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान शिवसे वरदान पाना तथा भगवान शिवद्वारा अर्जुनके सहायक 28, श्रीकृष्णकी महिमाका व वैशम्पायन उवाच जयद्रथस्तु सम्प्रेक्ष्य भ्रातरावुद्यतावु भौ । प्राधावत् तूर्णमव्यग्रो जीवितेप्सु: सुदु:खित:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भीम और अर्जुन दोनों भाइयोंको अपने बधके लिये तुले हुए देख जयद्रथ बहुत दुःखी हुआ और घबराहट छोड़कर प्राण बचानेकी इच्छासे तुरंत तीव्र गतिसे भागने लगा
vaiśampāyana uvāca | jayadrathas tu samprekṣya bhrātarāv udyatāv ubhau | prādhāvat tūrṇam avyagro jīvitepsuḥ suduḥkhitaḥ ||
বৈশম্পায়নে ক’লে—ভীম আৰু অৰ্জুন—দুয়ো ভ্ৰাতাক নিজৰ বধৰ বাবে উদ্যত দেখি জয়দ্ৰথ গভীৰ দুখত নিমজ্জিত হ’ল। প্ৰাণ ৰক্ষা কৰাৰ আকাংক্ষাৰে সি দ্বিধা ত্যাগ কৰি তৎক্ষণাৎ মহাবেগে পলাই গ’ল।
वैशम्पायन उवाच