Karṇa’s Counsel on Śrī
Fortune) and the Proposed Display before the Exiled Pāṇḍavas (कर्णवचनम् / श्रीप्रदर्शन-प्रस्तावः
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्नैरावतश्न ह । तावापतन्तौ सम्प्रेक्ष्य स बालोडर्कसमद्युति:,ये उस गर्जनाद्वारा चराचर प्राणियोंसहित इन तीनों लोकोंको मूर्छित-सा कर रहे थे। महान् मेघोंकी गम्भीर ध्वनिके समान उनकी उस गर्जनाको सुनकर चित्र और ऐरावत नामक दो महागज वहाँ दौड़े आये। कुमार स्कन्द सूर्यकी कान्तिके समान उद्धासित हो रहे थे। उन दोनों हाथियोंको आते देख उन अग्निकुमारने उन्हें दो हाथोंसे पकड़ लिया तथा एक हाथमें शक्ति और दूसरेमें अरुण शिखासे विभूषित और बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं विशाल शरीरवाले एक समीपवर्ती कुक्कुट (मुर्गै)-को पकड़कर उन महाबाहु कुमारने भयंकर गर्जना की और (उन हाथी-मुर्गे आदिको लिये हुए) क्रीडा करने लगे
utpetatur mahānāgau citraś ca airāvataś ca ha | tāv āpatantau samprekṣya sa bālo 'rka-samadyutiḥ ||
চিত্ৰা আৰু ঐৰাৱত—এই দুটা মহানাগ তাত দৌৰি আহিল। সিহঁত ঝপটিয়াই আহি থকা দেখি সেই বালক (স্কন্দ) সূৰ্য সদৃশ দীপ্তিমান আছিল।
मार्कण्डेय उवाच