Adhyāya 22: Śālva’s Weapon-Shower, Dāruka’s Wounding, and the Māyā-Report of Vasudeva’s Father
येन त्वं योधितो वीर द्वारका चावमर्दिता । एवमादि तु कौन्तेय श्रुत्वाहं सारथेवच:,“कोई शत्रु अपने घरमें आसनपर बैठा हो (युद्ध न करना चाहता हो), तो भी उसे नष्ट करनेमें नहीं चूकना चाहिये; फिर जो संग्राममें युद्ध करनेके लिये खड़ा हो, उसकी तो बात ही क्या है? अतः पुरुषसिंह! प्रभो! आप सभी उपायोंसे इस शत्रुको मार डालिये। वृष्णिवंशावतंस! इस कार्यमें आपको पुनः विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह मृदुतापूर्ण उपायसे वशमें आनेवाला नहीं। वास्तवमें यह आपका मित्र भी नहीं है; क्योंकि वीर! इसने आपके साथ युद्ध किया और द्वारकापुरीको तहस-नहस कर दिया, अतः इसको शीघ्र मार डालना चाहिये।” कुन्तीनन्दन! सारथिके मुखसे इस तरहकी बातें सुनकर मैंने सोचा, यह ठीक ही तो कहता है। यह विचारकर मैंने शाल्वराजका वध करने और सौभविमानको मार गिरानेके लिये युद्धमें मन लगा दिया
yena tvaṁ yodhito vīra dvārakā cāvamarditā | evamādi tu kaunteya śrutvāhaṁ sārathervacaḥ ||
বায়ুৱে ক’লে—হে বীৰ! এই শত্রুৱেই তোমাক যুদ্ধলৈ আহ্বান কৰিছিল, আৰু এই শত্রুৱেই দ্বাৰকাক বিধ্বস্ত কৰিছিল। হে কুন্তীনন্দন! সাৰথিৰ মুখৰ পৰা এই কথা শুনি—শত্রু যদি ঘৰত নিশ্চিন্তে আসনত বহিও থাকে, তথাপি তাক এৰি দিব নালাগে; তেন্তে যি ৰণভূমিত যুদ্ধৰ বাবে থিয় হৈ আছে, তাৰ কথা ক’ত—মই সেই উপদেশক যথার্থ বুলি মানিলোঁ। এইদৰে ভাবি মই যুদ্ধত মন দৃঢ় কৰিলোঁ—শাল্বৰাজক বধ কৰিবলৈ আৰু সৌভ বিমান-দুৰ্গক পতিত কৰিবলৈ।
वायुदेव उवाच
The passage frames a hard-edged kṣatriya ethic: when an aggressor has already committed grave harm (waging war and devastating a city), decisive action is presented as righteous and necessary; delay and soft measures are portrayed as ineffective against such hostility.
Vāyu reports that, after hearing the charioteer’s forceful advice—pointing to the enemy’s prior attack and the ruin of Dvārakā—he accepts the reasoning and resolves to engage fully in battle, aiming to kill Śālva and destroy the Saubha flying fortress.