Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha
Mahābhārata 3.214
देवो यः संस्थितस्तस्मिन्नब्बिन्दुरिव पुष्करे | क्षेत्रज् तं विजानीहि नित्यं योगजितात्मकम्,जैसे कमलके पत्तेपर पड़ी हुई जलकी बूँद निर्लिप्त होती है, उसी प्रकार ये आत्मदेव कलात्मक शरीरमें असंगभावसे स्थित हैं। वे ही क्षेत्रज्ञ हैं, आप उन्हें जानिये। वे योगसे अपने मन और बुद्धिपर अधिकार प्राप्त करनेवाले तथा नित्य हैं
devo yaḥ saṁsthitas tasminn abbindur iva puṣkare | kṣetrajñaṁ taṁ vijānīhi nityaṁ yogajitātmakam ||
যি দিৱ্য আত্মা দেহৰ ভিতৰত অৱস্থিত হৈও পদ্মপাতত থকা জলবিন্দুৰ দৰে নিৰ্লিপ্ত থাকে, তাক ক্ষেত্ৰজ্ঞ বুলি জানিবা। তেওঁ নিত্য, আৰু যোগেৰে মন-বুদ্ধিক জয় কৰা।
व्याध उवाच