Skanda-janma: Śivā/Svāhā, Agni, and the Manifestation of Guha
Mahābhārata 3.214
(तावग्निसहितौ ब्रह्मन् विद्धि वै प्राणमात्मनि ।) एकादशविकारात्मा कलासम्भारसम्भृतः । मूर्तिमन्तं हि तं विद्धि नित्यं योगजितात्मकम्,ब्रह्म! वे प्राण और अपान जठरानलके साथ रहते हैं। प्राणको आत्मामें स्थित जानिये। आत्मा एकादश इन्द्रियरूप विकारोंसे युक्त, षोडश- कलाओंके समूहसे सम्पन्न, शरीरको धारण करनेवाला तथा नित्य है। उसने योगबलसे मन-बुद्धिको अपने अधीन कर रखा है। इस प्रकार आत्माके सम्बन्धमें आपको जानना चाहिये
tāv agni-sahitau brahman viddhi vai prāṇam ātmani | ekādaśa-vikārātmā kalā-sambhāra-sambhṛtaḥ | mūrtimantaṃ hi taṃ viddhi nityaṃ yoga-jitātmakaṃ brahman ||
হে ব্ৰাহ্মণ! প্ৰাণ আৰু অপান জঠৰাগ্নিৰ সৈতে থাকে—প্ৰাণক আত্মাত স্থিত বুলি জানিবা। আত্মা একাদশ বিকাৰ (ইন্দ্ৰিয় আৰু মন)যুক্ত, কলাসমূহে সমৃদ্ধ, দেহ ধাৰণকাৰী, নিত্য, আৰু যোগবলৰে মন-বুদ্ধিক বশ কৰে—আত্মাক এইদৰে বুজিব লাগে।
व्याध उवाच