कामीकवन-समागमः
Kāmyaka Forest Meeting: Kṛṣṇa’s Visit; Mārkaṇḍeya and Nārada Arrive
हि आय >> (0) हि २ 7 एकोनाशीरत्याधिकशततमो<् ध्याय: भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठटिरद्वारा भीमकी खोज वैशम्पायन उवाच स भीमसेनस्तेजस्वी तथा सर्पवशं गतः चिन्तयामास सर्पस्य वीर्यमत्यद्भुतं महत्,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! इस प्रकार सर्पके वशमें पड़े हुए वे तेजस्वी भीमसेन उस अजगरकी अत्यन्त अद्भुत शक्तिके विषयमें विचार करने लग गये इस प्रकार श्रीमह्ाभारत वनपवके अन्तर्गत आजगरपर्वमें युधिष्ठिरको भीमसेनके दर्शनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उनासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७९ ॥। हि न (हुक है आस अशीर्त्याधिकशततमो<& ध्याय: युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना वैशम्पायन उवाच युधिष्ठिरस्तमासाद्य सर्पभोगेन वेष्टितम् । दयितं भ्रातरं धीमानिदं वचनमब्रवीत्
vaiśampāyana uvāca | yudhiṣṭhiras tam āsādya sarpabhogena veṣṭitam | dayitaṃ bhrātaraṃ dhīmān idaṃ vacanam abravīt ||
বৈশম্পায়ন ক’লে—জনমেজয়! এইদৰে সৰ্পৰ বশত পৰি থকা তেজস্বী ভীমসেন সেই অজগৰৰ অত্যন্ত আশ্চৰ্য আৰু মহান শক্তিৰ বিষয়ে চিন্তা কৰিবলৈ ধৰিলে। তাৰ পাছত ধীমন্ত যুধিষ্ঠিৰ তাত উপস্থিত হৈ, সাপৰ কুণ্ডলীত জড়িত নিজৰ প্ৰিয় ভ্ৰাতাক দেখি, কৰুণাৰে ব্যাকুল হৈ এই কথা ক’লে।
वैशम्पायन उवाच