प्रावृट्-शरत्-वर्णनम् — Description of the Monsoon and Autumn; Sarasvatī in the Pāṇḍavas’ Exile
गुहाकारेण वक््त्रेण चतुर्दष्टेण राजता दीप्ताक्षेणातिताम्रेण लिहानं सृक्किणी मुहुः,उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था। वह महाकाय होनेके साथ ही अत्यन्त बलवान् भी था। उसका प्रत्येक अंग शारीरिक विचित्र चिह्नोंसे चिह्नित होनेके कारण विचित्र दिखायी देता था। उसका रंग हल्दीके समान पीला था। प्रकाशमान चारों दाढ़ोंसे युक्त उसका मुख गुफा-सा जान पड़ता था। उसकी आँखें अत्यन्त लाल और आग उगलती-सी प्रतीत होती थीं। वह बार-बार अपने दोनों गलफरोंको चाट रहा था। कालान्तक तथा यमके समान समस्त प्राणियोंको भयभीत करनेवाला वह भयानक भुजंग अपने उच्छवास और सिंहनादसे दूसरोंकी भर्त्सना करता-सा प्रतीत होता था
vaiśampāyana uvāca | guhākāreṇa vaktreṇa caturdaṣṭreṇa rājatā dīptākṣeṇātitāmreṇa lihānaṃ sṛkkiṇī muhuḥ |
বৈশম্পায়নে ক’লে—গুহাৰ দৰে মুখ, চাৰিটা দীপ্ত দংশনে শোভিত, আৰু অতি ৰঙা জ্বলি উঠা চকুৰে সি বাৰে বাৰে মুখৰ কোণ চাটিছিল। কালান্তক আৰু যমৰ দৰে সকলো প্ৰাণীক ভয় দেখুৱাব পৰা সেই ভয়ংকৰ ভুজংগে নিজৰ ফোঁসফোঁস নিশ্বাসৰ গর্জন আৰু সিংহনাদ সদৃশ ধ্বনিয়ে যেন আনক ধমক দিছিল—ধৰ্মে নিয়ন্ত্ৰণ নকৰা বল কেনেকৈ ভয় হৈ উঠে, তাকেই প্ৰকাশ কৰিছিল।
वैशम्पायन उवाच