अध्याय ८ — शल्यस्य सत्कारः, वरदानं, पाण्डवसमागमश्च (Śalya’s Reception, the Boon, and Meeting the Pāṇḍavas)
सम्प्रहृष्टो यदा शल्यो दिदित्सुरपि जीवितम् । गूढो दुर्योधनस्तत्र दर्शयामास मातुलम्,जब हर्षमें भरे हुए राजा शल्य (अपने प्रति किये गये उपकारके बदले) प्राणतक देनेको तैयार हो गये, तब गुप्तरूपसे वहीं छिपा हुआ दुर्योधन मामा शल्यके सामने गया
samprahṛṣṭo yadā śalyo diditsur api jīvitam | gūḍho duryodhanas tatra darśayāmāsa mātulam ||
যেতিয়া আনন্দে উল্লসিত ৰজা শল্য উপকাৰৰ প্ৰতিদানস্বৰূপ প্ৰাণ পৰ্যন্ত দিবলৈও উদ্যত হ’ল, তেতিয়া তাতেই গোপনে লুকাই থকা দুৰ্যোধনে নিজৰ মাতুল শল্যৰ সন্মুখত নিজকে প্ৰকাশ কৰিলে।
वैशम्पायन उवाच