Udyoga Parva, Adhyāya 72 — Bhīmasena’s counsel on conciliation and Duryodhana’s disposition
एतावत् पाण्डवानां हि नास्ति किंचिदिह स्वकम् । नामधेयं च गोत्र च तदप्येषां न शिष्यते,(क्या आप वह दिन भूल गये, जब कि) दुर्योधनने भाइयोंसहित आपको अपने अनुचित वचनोंद्वारा मार्मिक पीड़ा पहुँचायी थी। वह अत्यन्त हर्षसे फ़ूलकर अपनी मिथ्या प्रशंसा करता हुआ अपने भाइयोंके साथ कहता था--“अब पाण्डवोंके पास इस संसारमें “अपनी” कहनेके लिये इतनी-सी भी कोई वस्तु नहीं रह गयी है। केवल नाम और गोत्र बचा है, परंतु वह भी शेष नहीं रहेगा"
etāvat pāṇḍavānāṃ hi nāsti kiṃcid iha svakam | nāmadheyaṃ ca gotraṃ ca tad apy eṣāṃ na śiṣyate ||
এতিয়া পাণ্ডৱসকলৰ এই জগতত ‘নিজৰ’ বুলি ক’ব পৰা একোৱেই নাই। কেৱল নাম আৰু গোত্ৰহে আছে—কিন্তু সেয়াও, সি মিছা আত্মপ্ৰশংসাত উন্মত্ত হৈ গৰ্বেৰে কৈছিল, তেওঁলোকৰ বাবে নাথাকিব।
युधिछिर उवाच