Udyoga-parva Adhyāya 28: Dharmādharmalakṣaṇa in Āpad
Crisis-Discernment of Right and Wrong
कर्मणा<<हु: सिद्धिमेके परत्र हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके । नाभुज्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्येद् विद्वानपीह विदहितं ब्राह्म॒णानाम्,कोई तो (गृहस्थाश्रममें रहकर) कर्मयोगके द्वारा ही परलोकमें सिद्धि-लाभ होनेकी बात बताते हैं,- दूसरे लोग कर्मको त्यागकर ज्ञानके द्वारा ही सिद्धि (मोक्ष)-का प्रतिपादन करते हैं। विद्वान् पुरुष भी इस जगत्में भक्ष्य-भोज्य पदार्थोको भोजन किये बिना तृप्त नहीं हो सकता, अतएव दिद्वान् ब्राह्मणके लिये भी क्षुधानिवृत्तिके लिये भोजन करनेका विधान है
karmaṇā huḥ siddhim eke paratra hitvā karma vidyayā siddhim eke | nābhujjāno bhakṣyabhojyasya tṛpyed vidvān apīha vihitaṃ brāhmaṇānām ||
কিছুমানে কয়—কৰ্মৰ দ্বাৰাই পৰলোকে সিদ্ধি লাভ হয়; আন কিছুমানে কয়—কৰ্ম ত্যাগ কৰি জ্ঞানৰ দ্বাৰাই সিদ্ধি (মোক্ষ) লাভ হয়। কিন্তু এই জগতত বিদ্বান লোকেও ভক্ষ্য-ভোজ্য নাখালে তৃপ্ত হ’ব নোৱাৰে; সেয়ে ব্ৰাহ্মণসকলৰ বাবেও ক্ষুধা নিবারণৰ নিমিত্ত আহাৰ বিধেয়।
वायुदेव उवाच